हिंदी भाषा का बदलता स्वरूप: परम्परा से डिजिटल युग तक
- डाॅ०राकेश सक्सेना, एटा
भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम नहीं बल्कि किसी समाज की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना, जीवन दृष्टि और सामाजिक सम्बन्धों की संवाहिका होती है। हिंदी भाषा ने भी भारतीय समाज के बदलते सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी परिवेश के साथ निरंतर अपना स्वरूप बदला है। संस्कृत, प्राकृत,अपभ्रंश और विभिन्न लोकभाषाओं की विकास परम्परा से निर्मित आधुनिक हिंदी ने भक्ति आंदोलन,औपनिवेशिक काल, राष्ट्रवादी आंदोलन, स्वतंत्रता प्राप्ति, जनसंचार माध्यमों और भूमंडलीकरण के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए आज डिजिटल युग में प्रवेश किया है। आज हिंदी का स्वरूप मुद्रित पुस्तकों और औपचारिक लेखन तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, ब्लॉग, बेबसाइट, डिजिटल पत्रकारिता, मोबाइल संदेश, वीडियो मंच, पाॅडकास्ट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे तकनीकी माध्यमों ने हिंदी के प्रयोग की नई संभावनाएँ खोली हैं, साथ ही रोमन लिपि में हिंदी लेखन, हिंग्लिश,संक्षिप्त शब्दावली,इमोजी और त्वरित संचार ने हिंदी की पारम्परिक भाषिक संरचना के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं,इसलिए आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि हिंदी किस दिशा में बदल रही है और इस परिवर्तन का उसके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
भाषा में परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कोई भी जीवित भाषा पूर्णत: स्थिर नहीं रह सकती। समाज में नए विचार आते हैं तो नए शब्दों की आवश्यकता होती है। नई तकनीक विकसित होती है तो नए शब्द आते हैं। सामाजिक सम्बन्धों में बदलाव होता है तो सम्बोधन और अभिव्यक्ति के तरीके भी बदलते हैं, अत: भाषा की जीवंतता का प्रमाण उसका परिवर्तन है। समस्या परिवर्तन में नहीं, उस समय उत्पन्न होती है जब परिवर्तन के कारण भाषा की अभिव्यक्तिगत क्षमता, व्याकरणिक स्पष्टता या सांस्कृतिक स्मृति कमजोर होने लगे। हिंदी की शक्ति उसके आधुनिक शब्दकोश में नहीं अपितु उसकी व्यापक लोक सांस्कृतिक जड़ों में है। भारतीय समाज में भाषा और लोकजीवन का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें-मुहावरे आदि परम्पराएँ हिंदी के भाषिक संसार को समृद्ध करती रहीं हैं। ' जैसा देश, वैसी भाषा ' केवल कहावत नहीं, हिंदी के विकास की वास्तविकता है। अलग-अलग क्षेत्रों ने हिंदी को अपनी ध्वनि, शब्द और मुहावरे प्रदान किए। ब्रजभाषा ने हिंदी साहित्य की कृष्णभक्ति और शृंगार की समृद्ध अभिव्यक्ति दी। अवधी ने रामकथा और लोकजीवन को स्वर दिया। भोजपुरी, बुंदेली, मैथिली आदि ने हिंदी की शब्द सम्पदा और सांस्कृतिक चेतना को व्यापक बनाया। भक्तिकाल में तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, रैदास आदि ने हिंदी का लोकव्यापीकरण किया। आधुनिक हिंदी के निर्माण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने आधुनिक पत्रकारिता, नाटक और गद्य को नई दिशा दी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा के परिष्कार और अनुशासन पर बल दिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भाषा का प्रश्न राष्ट्रीय चेतना से जुड़ गया। समाचार पत्रों की भाषा, टेलीविजन, डिजिटल पत्रकारिता ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया। शीर्षक छोटे हो गए, समाचार प्रस्तुति त्वरित हुई है और पाठक टिप्पणी के माध्यम से भाषिक संवाद का हिस्सा बन गया है।
इंटरनेट ने हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर प्रस्तुत किए हैं। पहले हिंदी में प्रकाशन के लिए मुद्रण की आवश्यकता होती थी अब कोई भी व्यक्ति ब्लॉग, बेबसाइट या सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी में सामग्री प्रकाशित कर सकता है। डिजिटल युग ने हिंदी को अवसर तो दिए हैं लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से लिखने के कारण वर्तनी की अनेक त्रुटियाँ दिखाई देतीं हैं। रोमन लिपि के अत्यधिक प्रयोग से देवनागरी लेखन अभ्यास प्रभावित हो सकता है। हिंग्लिश का अतिरेक भाषिक अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है। त्वरित डिजिटल संचार के कारण गंभीर और चिंतनपरक लेखन के लिए समय कम होता जा रहा है। इन सभी चुनौतियों के बावजूद हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन पत्रकारिता, ई-पुस्तकें, ऑडियो-वीडियो साहित्य, पाॅडकास्ट, डिजिटल शोध, मशीन अनुवाद, भाषा तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक हिंदी शिक्षण आदि विस्तार का अवसर बन सकते हैं।
अंतत: कहा जा सकता है कि हिंदी भाषा का वर्तमान स्वरूप उसकी हजारों वर्षों की परिवर्तनशील यात्रा का परिणाम है। डिजिटल युग ने हिंदी को अभूतपूर्व विस्तार दिया है, सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, यूनिकोड ने देवनागरी को डिजिटल आधार दिया है, ऑनलाइन शिक्षा ने हिंदी में ज्ञान की नई सम्भावनाएँ पैदा की हैं। इन परिस्थितियों में हिंदी के प्रति न तो अंध परम्परावाद उचित है और न ही अंध आधुनिकतावाद। आवश्यक है कि हिंदी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक तकनीक को स्वीकार करे। हिंदी की शक्ति उसके परिवर्तन में है और उसकी पहचान परम्परा में निहित है, इसलिए हिंदी के भविष्य की सही दिशा यही होगी,जिसमें परम्परा से संस्कार,आधुनिकता से विस्तार, तकनीक से गति और साहित्य से संवेदना प्राप्त हो।
- डाॅ०राकेश सक्सेना,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा, उ०प्र०207001
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