लघुकथा :
कल देखेंगे
“वर्मा जी, घर में सब ठीक है?”
“नहीं यार… बेटे से बात बिगड़ गई।”
“किस बात पर?”
“पैसों को लेकर। समझाया… वह नाराज़ हो गया।”
“फोन किया?”
“किया था। उसने काट दिया।”
“अब?”
“बस सोच रहा हूँ… क्या करूँ?”
“आज ही?”
“मन नहीं मान रहा।”
वर्मा जी कुछ पल चुप रहे।
“बात जरूरी है… या आज ही जरूरी है?”
शर्मा जी ठहर गए।
“शायद बात जरूरी है।”
“तो कल कर लेना।”
“अगर तब भी न माने?”
“फिर समझाना।”
“और फिर भी?”
“कुछ बातें समझाने से नहीं… समय से समझ आती हैं।”
शर्मा जी की आँखें भर आईं।
“बाप हूँ यार… नाराज़ बेटा अच्छा नहीं लगता।”
वर्मा जी ने उनका हाथ दबाया।
“पता है।”
“रात कैसे कटेगी?”
“आज उसे सुलझाना मत… बस दिल को संभालो।”
“और कल?”
“कल फिर बेटे को फोन करना।”
“अगर उसने फिर नहीं उठाया?”
वर्मा जी धीरे से बोले-
“बाप की आवाज़ देर से सही… अक्सर दिल तक पहुँचती है।”
शर्मा जी ने आँखें पोंछीं।
“तो आज?”
“आज खुद को माफ कर दो।”
“किस बात के लिए?”
“हर बात तुरंत ठीक न कर पाने के लिए।”
दोनों उठे।
शर्मा जी ने आसमान की ओर देखा-
“शायद सुबह… सिर्फ सूरज नहीं लाती।”
वर्मा जी मुस्कुराए-
“हाँ शर्मा जी… कभी-कभी सुबह रिश्तों के लिए एक और मौका भी लाती है।”
-डॉ रीटा अरोड़ा, करनाल
Tags:
कथा कहानी
.jpg)