ad

लघुकथा : धर्म की सीमा - विभा रानी श्रीवास्तव, पटना


लघुकथा : 

धर्म की सीमा

आरती की थाली मेज़ पर रखी थी। रोली की लालिमा अभी भाई के माथे पर ताज़ा थी। दीदी ने राखी की गाँठ कसते हुए उसकी कलाई को कुछ पल देखा और अनायास मुस्करा दी।

“दीदी! मैं प्रतीक्षा में रह गया, कल आप कार्यक्रम में क्यों नहीं आ सकीं?” भाई ने मिठाई का एक और टुकड़ा मुँह में रखते हुए पूछा।

“ऐसी भी क्या बात हो गई थी?” भाई का स्वर रंग बदल रहा था।

“कल का कार्यक्रम तीन बजे होना था। ढाई बजे तक पहुँच जाने की बात तय थी। अचानक समय बदलकर पाँच बजे कर दिया गया। संदेश सबको एक साथ भेजा गया था… लेकिन सबको एक साथ तो नहीं मिल पाया?” दीदी की मुस्कान थोड़ी गहरी हुई। वह कुछ क्षण चुप रहीं, फिर कहा।

“क्या मतलब? आपकी बातें हमेशा जलेबी क्यों होती है?” भाई ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“मतलब यह कि जो समय के पाबन्द थे, वे ढाई बजे पहुँचने के लिए ही अपना काम समेटकर निकल पड़े। फोन का स्वर तब बजा जब वे राह में थे, उन्हें देर से सूचना मिली।”

“और जो देर से पहुँचने वाले थे?” भाई हँस पड़ा।

“वे ढाई बजे भी आराम से मोबाइल देख रहे होंगे, उन्हें संदेश जल्दी मिल गया। आराम से विजेता की तरह पाँच बजे पहुँचे… और कार्यक्रम में समय के पाबंद दिखाई दिए।”

भाई की हँसी धीरे-धीरे थम गई।

दीदी ने उसकी कलाई पर बँधे धागे को सहलाया।

“बस, यही समझाना है तुझे। कभी-कभी समय की उलटी चाल में लापरवाही भी समझदारी दिखाई देती है और ईमानदार कोशिश बेवक्त असफल हो जाती है।”

भाई को साँप सूंघ गया था-

“लेकिन…” दीदी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “इससे अपने सही होने का रास्ता मत बदलना। समय की कद्र करना, जिम्मेदारी निभाना और अपने उसूलों पर टिके रहना। हर बार दुनिया तुझे सही साबित करे, यह जरूरी नहीं।”

दोनों ने एक साथ राखी की गाँठ पर उँगली रख दी।

विभा रानी श्रीवास्तव, पटना
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post