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क्रोध जहर है, क्षमा अमृत; सरल भावों से जीवन बने सुखमय


क्रोध जहर है, क्षमा अमृत; सरल भावों से जीवन बने सुखमय

घर-परिवार में प्रेम की जरूरत, क्रोध नहीं क्षमा को बनाएं जीवन का आधार

इटारसी। क्रोध मनुष्य के जीवन में अशांति और तनाव का कारण बनता है। सामने वाला व्यक्ति यदि क्रोध में कुछ कह भी दे तो उसके शब्दों को मन पर लेकर बैठने की आवश्यकता नहीं है। शब्द चिपकने वाली वस्तु नहीं हैं। किसी ने कुछ कह दिया तो उसे वहीं छोड़ देना चाहिए। यह बात आर्यिका संघ प्रमुख  भावनामति माताजी ने कही।

दूसरी लाइन के महावीर भवन में आर्यिका संघ का वर्षायोग चातुर्मास चल रहा है। संघ में आर्यिका भक्तिमति माताजी व सदयमति माताजी भी शामिल हैं। जैन समाज के दशलक्षण महापर्व पर प्रवचन में आर्यिका संघ प्रमुख भावनामति ने कहा कि क्रोध आग के समान है। जब तक नीचे आग रहेगी, दूध उबलता रहेगा, लेकिन आग शांत होते ही दूध अपने आप शांत हो जाएगा। इसी प्रकार सामने वाला व्यक्ति यदि क्रोध में है तो हमें नरम हो जाना चाहिए। थोड़ी देर मौन रहने पर उसका क्रोध भी अपने आप शांत हो जाएगा। क्रोध जहर है और जहर से दूर रहना ही समझदारी है।

उन्होंने कहा कि आज घर-घर में तनाव देखने को मिल रहा है। दाम्पत्य जीवन में भी संघर्ष बढ़ रहा है। पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन आपसी प्रेम और स्नेह का अभाव दिखाई देता है। केवल साथ-साथ रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रेमपूर्वक साथ रहना जरूरी है। आज परिवार और समाज को सबसे अधिक आवश्यकता प्रेम की है।

माताजी ने कहा कि जिन घड़ियों में हम हंस सकते हैं, उन घड़ियों में रोना क्यों? जीवन में दूसरों को गिराने के बजाय गिरे हुए को उठाने का प्रयास करना चाहिए। किसी को न उठाएं तो कोई बात नहीं, लेकिन किसी को गिराएं नहीं—यही भी बड़ी बात है।

उन्होंने कहा कि क्रोध आने पर जीभ पर नियंत्रण और मौन को अपना लेना चाहिए। उत्तम क्षमा को जीवन में उतारकर ही क्रोध पर विजय पाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि क्रोध में कही गई बातों को यदि सामने वाला व्यक्ति हंसकर टाल दे तो विवाद की स्थिति ही समाप्त हो जाती है। इसलिए क्रोध को भगाइए और क्षमा को अपनाइए।

सरल भाव ही आर्जव धर्म : 

आर्यिका भावनामति ने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि सरल भावों को आर्जव कहते हैं। मनुष्य उपवास करे, धार्मिक अनुष्ठान करे और दस धर्मों की आराधना करे, लेकिन उसके व्यवहार में सरलता नहीं आई तो उसकी साधना अधूरी है। दुनिया की नजरों में व्यक्ति धर्मात्मा बन सकता है, लेकिन परमात्मा की नजरों में सच्चा धर्म तभी है, जब उसके भीतर सरलता और निश्चलता हो।

उन्होंने कहा कि दूसरों को धोखा देना वास्तव में स्वयं को धोखा देना है। जीवन में सफलता छल-कपट से नहीं, बल्कि पुण्य के उदय से प्राप्त होती है। बाहर से कुछ और और अंदर से कुछ और होना ही कपट है। हमारा घर-परिवार और समाज इस प्रकार के व्यवहार से मुक्त होना चाहिए।

माताजी ने कहा कि केवल मीठा बोलने वाला व्यक्ति हमेशा सरल और निष्कपट हो, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए व्यक्ति को अपने विवेक से व्यवहार करना चाहिए। अपने बनकर ही कई बार लोग विश्वास को ठेस पहुंचाते हैं। इसलिए कथनी और करनी में एकरूपता होना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि जहां कुटिलता का अभाव और सरलता का भाव होता है, वहीं आर्जव धर्म प्रकट होता है। माया और कपट आत्मा को बांधने वाले कषाय हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को मायाचारी और छल-कपट से स्वयं को मुक्त करने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

आर्यिका भावनामति ने कहा मन, वचन और कर्म की कपटता छोड़कर निश्चल बुद्धि अपनाएं। कथनी और करनी एक हो, दशा कुछ और दिशा कुछ न हो—यही सच्ची सरलता है।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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