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परिवर्तिनी एकादशी : डोल ग्यारस -विजय प्रकाश पारीक , मन्दसौर


एकादशी पर्व विशेष ∆

परिवर्तिनी एकादशी - डोल ग्यारस

_आत्म-रूपांतरण और चेतना के करवट बदलने का पर्व_ 

- विजय प्रकाश पारीक
  स्तंभकार एवं चिंतक

प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर

    यूं तो प्रथम पूज्य श्री गणेश विराजमान चतुर्थी से हैं और अनंत चतुर्दशी तक रिद्धि सिद्धि के दाता गणपति बप्पा विराजित रहेंगे। इस बार दो दिवस अतिरिक्त कृपावन्त हैं श्री गणेश । कथा है कि श्री गणेश और श्री हरि की पूजा अर्चना का विशेष महत्व है इस परिवर्तीनी एकादशी पर्व पर। ग्राम और नगर के देवालयों मन्दिरों में विराजित श्री हरि और अन्य देवताओं के विग्रह को बेवाण में झांकी सजा कर झूले और भगवन्नाम के साथ शोभा यात्रा चल समारोह निकाला जाता है और माताएं बहनें पुरुषों और युवाओं की टोलियां भक्ति भाव से शामिल हो रहे हैं । 
यह दृश्य मालवा मेवाड़ हाड़ौती निमाड़ मारवाड़ कंठाल महाकौशल 
के अलावा गुजरात महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में भी देखा जाता है ।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी पर्व का विशेष महत्व भी है ​चेतना के अंतरंग क्षितिज पर जब परिवर्तन की बयार बहती है, तो वह केवल समय चक्र का परिवर्तन नहीं होती, बल्कि आत्मा के पुनर्जागरण का निमंत्रण होती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पुण्यमयी तिथि परिवर्तिनी एकादशी (पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी अथवा डोल ग्यारस ,  जल झूलनी एकादशी ) इसी आंतरिक रूपांतरण और आध्यात्मिक जागरण का दिव्य संदेश लेकर आती है।

इस ​वर्ष 2026 में 22 सितंबर (मंगलवार) को यह पावन व्रत रखा जाएगा। साधना की इस रात्रि के पश्चात 23 सितंबर को प्रातः 06:18 बजे से 08:43 बजे का समय व्रत पारण हेतु सर्वथा उत्तम और फलदायी रहेगा।

​  *आध्यात्मिक चेतना और परिवर्तित दृष्टिकोण*

​धार्मिक अनुश्रुतियों के अनुसार, चातुर्मास की गहन योगनिद्रा के मध्य इस पावन तिथि को जगदाधार भगवान विष्णु अपनी शयन मुद्रा में करवट बदलते हैं। प्रतीकात्मक रूप से, यह करवट केवल शरीर का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारे जीवन में व्याप्त जड़ता से सजगता की ओर बढ़ने का एक चेतना-परिवर्तन है।
​आत्म-शुद्धि एवं पाप-मुक्ति: यह पावन अवसर जीवन के अनजाने में हुए विचलन और मानसिक कलुषता को धोकर आत्मा को सात्विकता से भर देता है।
​असीम पुण्य की प्राप्ति: निष्काम भाव से की गई भगवान वामन की आराधना साधक को वाजपेय यज्ञ के समान महापुण्य और परम शांति प्रदान करती है।

​   *त्याग, विनम्रता और अनन्य समर्पण की गाथा*

​त्रेतायुग के दानवीर राजा बलि की कथा मात्र इतिहास नहीं, बल्कि अहंकार के विसर्जन और समर्पण का अनुपम अध्याय है। जब बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर आधिपत्य जमा लिया, तब देव-रक्षा हेतु श्रीहरि ने एक छोटे बालक (वामन रूप) में प्रवेश किया।
​मांगे गए केवल तीन पग भूमि के वचन पर जब वामन अवतार प्रभु श्री हरि ने अपने त्रिविक्रम रूप से संपूर्ण ब्रह्मांड को दो ही पगों में नाप लिया, तब तीसरे पग के लिए राजा बलि ने निसंकोच अपना शीश नवा दिया। यह कथा हमें सिखाती है कि जब आप ईश्वर के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं, तो ईश्वर केवल आपकी रक्षा ही नहीं करते, बल्कि स्वयं आपके द्वारपाल बनकर आपकी रक्षा का वचन लेते हैं।

​   *करुणा और विवेक:* क्या दान करें, किसका त्याग करें
​एकादशी केवल उपवास नहीं, बल्कि मन और वृत्तियों के परिष्कार का नाम है। इस दिन हमारी देने की भावना (करुणा) और न लेने की मर्यादा (विवेक) दोनों ही जागृत होनी चाहिए।

​   *करुणा की सरिता*: शुभ दान
​पीत वर्ण का सौंदर्य: भगवान विष्णु को प्रिय पीले वस्त्र, चने की दाल, हल्दी, केला और स्वर्ण का दान मन में ज्ञान के प्रकाश को बढ़ाता है।
*​दही एवं मिश्री:* वामन रूप की प्रीति हेतु शीतल दही व मिश्री का दान अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

*​अन्न व गौ-सेवा*: असहायों को अन्न-जल और गौ-माता को हरा चारा व गुड़ खिलाना आत्म-संतोष और समृद्धि का कारक है।

   ​🚫 विवेक का नियम: वर्जित आचरण
​चावल का त्याग: इस दिन चावल का दान व सेवन पूरी तरह वर्जित है, क्योंकि यह मन में तामसिकता का संचार करता है।

*​तामसिकता से दूरी*: लहसुन, प्याज, एवं मदिरा-मांस जैसी तामसिक वस्तुओं से स्वयं भी दूर रहें और दूसरों को भी इनसे बचाएं।
*​संयम और सौम्यता*: लोहे की तीखी वस्तुएं, काले वस्त्र और किसी को ऋण देना इस दिन वर्जित माना गया है, ताकि घर की शांति और लक्ष्मी-कृपा बनी रहे।

*दिनचर्या*: आत्म-संयम एवं ध्यान ​प्रभाती वेला में स्नान कर पीत वस्त्र धारण करें और हस्तकमल में जल लेकर संकल्प लें। दिनभर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" की मधुर ध्वनि तथा विष्णु सहस्रनाम के पाठ से अपने वातावरण को स्पंदित करें। वाद-विवाद, चुगली और कटु वचनों से दूर रहकर अपने भीतर के मौन और माधुर्य को पहचानें।

​परिवर्तिनी एकादशी हमें सिखाती है कि जीवन में सच्चा परिवर्तन बाहर की परिस्थितियों को बदलने से नहीं, बल्कि भीतर के दृष्टिकोण को करवट देने से आता है। आइए, इस पावन अवसर पर अपने भीतर के वामन (विनम्रता) को जगाएं और सर्वस्व समर्पण के साथ जीवन को प्रकाशमय बनाएं।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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