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लघु कथा : कलकत्ते का सावन - डॉ. विजयता दुबे कोलकाता


  लघु कथा :

 कलकत्ते का सावन

     सावन की पहली तेज बारिश उस दिन कलकत्ते पर कुछ यूँ उतरी, जैसे शहर की पुरानी थकान धोने आई हो।
कॉलेज स्ट्रीट की किताबों की दुकानों के बाहर तिरपाल तन गए थे। ट्राम धीरे-धीरे भीगी सड़कों पर सरक रही थी और पीली टैक्सियों की रोशनी पानी में अपना प्रतिबिंब बना रही थी।
श्रेया लाइब्रेरी से बाहर निकली तो बारिश और तेज हो चुकी थी।
पास खड़े चायवाले ने आवाज़ लगाई—
“दीदी, चाय हो जाए? सावन की बारिश बिना चाय के अधूरी है।”
श्रेया मुस्कुरा दी।
“और कलकत्ता?”
चायवाला हँस पड़ा—
“कलकत्ता तो बारिश में ही पूरा होता है।”
चाय की भाप और बारिश की बूँदों के बीच अचानक श्रेया को अपना बचपन याद आ गया—नानी की आवाज़, खिड़की पर गिरती बूँदें और कागज़ की नावों के पीछे भागती वह छोटी-सी बच्ची।
बारिश थमी तो वह गंगा किनारे जा पहुँची।
हावड़ा पुल की रोशनियाँ पानी में काँप रही थीं। हवा में मिट्टी, नदी और भीगे शहर की मिली-जुली खुशबू थी।
श्रेया ने नदी से कहा—
“तुम हर सावन इतनी पुरानी यादें क्यों लौटा देती हो?”
गंगा की लहरें किनारे से टकराईं।
उसे लगा जैसे कोई कह रहा हो—
“क्योंकि कुछ शहर सिर्फ जगह नहीं होते…
वे हमारी स्मृतियों का घर होते हैं।”
उस शाम कलकत्ता भीगा हुआ था,
और श्रेया की आँखें भी।
फर्क बस इतना था—
शहर की बारिश सड़कों पर थी,
और उसकी बारिश भीतर।

- डॉ. विजयता दुबे 
कोलकाता 
पश्चिम बंगाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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