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सरोकार : अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को 89 महीने बाद मिली छात्रवृत्ति ! - डाॅ. चन्दर सोनाने , उज्जैन



सरोकार : 

अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को 89 महीने बाद मिली छात्रवृत्ति !

लाडली बहना को हर माह मिल रहे हैं 1500 रूपए                     
                               
- डाॅ. चन्दर सोनाने , उज्जैन

    केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के कल्याण और विकास के लिए अनेक योजनाएं संचालित कर रही है। किन्तु उन योजनाओं का हकीकत में क्या हश्र होता है ? यह दंेखे तो दुखद एवं आश्चर्यजनक तस्वीर सामने आती है। हाल ही में सांसद श्री के. सी. वेणुगोपाल की अध्यक्षता में हुई लोक लेखा समिति (पीएसी) की एक बैठक में यह पाया गया कि अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को प्री मैट्रिक छात्रवृत्ति में 48 महीने और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति में 89 महीने तक की देरी हुई है !
जहाँ अनुसूचित जाति के छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति में रिकाॅर्ड तोड़ देरी होने की रिपोर्ट सामने आ रही है, वहीं लाड़ली बहना को प्रतिमाह 1500 रूपए नियमित रूप से मिल रहे है। क्योंकि ये लाडली बहना सरकारों के लिए वोटर है ! जबकि अनुसूचित जाति के विद्यार्थी वोटर नहीं हैं !
                 सांसद की लोक लेखा समिति ने अक्टूबर 2026 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की वर्ष 2025 की ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए चलाई जा रही प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाओं में भारी गड़बड़ियों और देरी को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा किया है। 
                 उक्त समिति की बैठक में यह पाया गया कि छात्रवृत्ति वितरण में अत्यधिक देरी हुई है। प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति ऑडिट में पाया गया कि पात्र छात्रों को प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति का पैसा मिलने में 48 महीने (4 साल) तक की देरी का सामना करना पड़ रहा है। उच्च शिक्षा के लिए दी जाने वाली पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति में छात्रों को 89 महीने (7 साल से अधिक) तक का इंतजार करना पड़ा है। समिति ने चिंता जताई कि कई गरीब छात्रों को तो कोई राशि मिली ही नहीं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
                इस समिति की बैठक में अपात्रों को भुगतान और सत्यापन में खामियां भी पाई गई। जैसे कैग की रिपोर्ट में कई फ्रॉड मार्कर्स (धोखाधड़ी के संकेत) रेखांकित किए गए। समिति ने पाया कि छात्रों की आय और जाति पात्रता का सही से भौतिक सत्यापन ही नहीं किया गया। इसके परिणामस्वरूप, वास्तविक और जरूरतमंद अनुसूचित जाति के बच्चे छात्रवृत्ति से वंचित रह गए, जबकि अपात्र लाभार्थियों को भुगतान पहुंच गया।
               समिति ने मंत्रालयों और राज्यों से जवाबदेही निश्चित करने की भी कार्रवाई की है। समिति की बैठक के समक्ष केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने अपनी सफाई में कहा कि इन योजनाओं के क्रियान्वयन का बड़ा जिम्मा राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों पर होता है। इस पर लोक लेखा समिति ने नाराजगी जताते हुए मंत्रालय को कैग द्वारा चिह्नित हर एक खामी पर एक महीने के भीतर विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट (की गई कार्रवाई की रिपोर्ट) सौंपने का सख्त निर्देश दिए हंै।
                उक्त समिति ने 6 राज्यों के मुख्य सचिवों पर विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई करने के लिए भी निर्णय लिया है। इसके लिए समिति ने इस मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले और सबसे ज्यादा गड़बड़ी वाले 6 राज्यों को समन जारी किया था। उन 6 राज्यों के नाम हैं उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक। इन 6 राज्यों के मुख्य सचिव मौखिक गवाही देने के लिए लोक लेखा समिति के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित ही नहीं हुए। पीएसी ने इसे संसद की अवमानना माना है। इसके चलते समिति ने सर्वसम्मति से इन मुख्य सचिवों के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने का फैसला किया है।
                समिति के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया है कि एक दलित बच्चे के लिए छात्रवृत्ति यह तय करती है कि वह स्कूल-कॉलेज जा पाएगा या नहीं। पीएसी इसे सामाजिक न्याय और संवैधानिक दायित्व मानती है, इसलिए जब तक हर पात्र छात्र को उसका हक नहीं मिल जाता, तब तक संबंधित मंत्रालयों और राज्यों की जवाबदेही तय की जाती रहेगी। जिस प्रकार अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति में अत्यधिक देरी हो रही है, उसी प्रकार अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति में भी माना जा सकता है कि इसी प्रकार की देरी हो रही होगी !
    संसद की लोकलेखा समिति (पीएसी) की समीक्षा बैठक में जो रिपोर्ट जारी की गई है, वह चैंकाने वाली है। केन्द्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे यदि अनुसूचित जाति और जनजाति के कल्याण और विकास के लिए कोई योजनाएं बनाएं तो उसके क्रियान्वयन के लिए भी जिम्मेदारी तय करें। और जो भी उन जिम्मेदारियों को पूरा करने में अक्षम सिद्ध हो तो उसके विरूद्ध़ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि चलाई जा रही योजनाओं का सही लाभ वंचितों को मिल सके और तभी योजनाओं की सफलता मानी जायेगी अन्यथा सारी योजनाएं कागज पर ही रह जायेगी !
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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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