काव्य :
जय माँ सिद्धिदात्री
जब जब नवरात्र में मां तू आती है
तेरी मूरत में मेरी माँ मुझे नजर आती है
कल की बात ही तो लगती है
माँ स्नान कर पास ही मंदिर देवी ढारने
नंगे पैरों हाथ में जल का पात्र थामे
मुँह में मंत्र जपते दौड़ी जाती थी
मैं अलसाया थोड़ा सोया थोड़ा जागा
निहारता रहता उसकी तन्मयता
मेरा मन उद्वेलित हो जाता
अब जरूर माँ लाएगी मिट्टी का खिलौना
साथ में लबदुर ओ मीठी मीठी लैय्या
मिलकर साथ बांटेंगे हम और भैय्या
सांय होते ही उसे पुनः तेरी चौखट याद दिलाती
बच्चों चलो मेला देखन तैयार कराती
वो तो निहारती मां दुर्गे तुझे श्रद्धावनत होकर
पर हम धन्य हो जाते ऐसी मां को पाकर
मेरी तो तू ही दुर्गा,तू ही भवानी मां
जीते जी तो न ले पाई तेरी जगह कोई माँ
जाने के बाद तो तू ही बन गई सिद्धिदात्री मां
अब जब भी करता दर्शन दुर्गा भवानी का माँ
पूरण हो जाती सभी मनोकामना माँ
सोचता हूं क्यों व्यर्थ गवाऊं जीवन माँ
तेरे रज चरणों में ही क्यूँ न शीश झुकाऊं मां .
--हरीश श्रीवास्तव,भोपाल
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