आलेख :
हिंदी साहित्य में लघुकथा : छोटी काया, व्यापक जीवन-दृष्टि
- विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
हिंदी साहित्य में लघुकथा की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि रचना का महत्त्व उसके आकार से नहीं, उसके अनुभव और प्रभाव से तय होता है। कुछ पंक्तियों में भी कोई कथा मनुष्य के भीतर एक लंबी बहस शुरू कर सकती है। किंतु लघुकथा को केवल ‘कम शब्दों वाली कहानी’ मानना भूल होगी। उसमें कथा-सूत्र, पात्र या स्थिति, अर्थपूर्ण तनाव और ऐसी परिणति चाहिए जो कहे हुए के साथ अनकहे को भी पाठक के अनुभव में जगा दे।
भारतीय कथा-परंपरा में पंचतंत्र, जातक, लोककथाएँ, दृष्टांत और बोधकथाएँ संक्षिप्त कथन के पुराने उदाहरण हैं। फिर भी इन्हें आज की हिंदी लघुकथा का सीधा पर्याय नहीं माना जा सकता। उनकी रचना-प्रेरणा प्रायः नीति, शिक्षा अथवा मनोरंजन से जुड़ी थी; आधुनिक लघुकथा अधिकतर जीवन की जटिलता, विडंबना और सामाजिक यथार्थ से अपना अर्थ ग्रहण करती है। परंपरा ने उसे संक्षेप का संस्कार दिया, आधुनिक समाज ने उसकी अलग पहचान बनाई।
हिंदी साहित्य को लघुकथा से क्या मिला, यह सवाल विचारणीय है। यह अभिव्यक्ति की एक सशक्त विधा है।
लघुकथा ने सबसे पहले साधारण दिखने वाले क्षण को साहित्यिक गरिमा दी। दफ्तर का एक संवाद, अस्पताल के बाहर की प्रतीक्षा, घरेलू कामगार की चुप्पी या किसी बच्चे का प्रश्न, ऐसे दृश्य बड़े सामाजिक तंत्र की असमानता खोल सकते हैं। उपन्यास व्यापक संसार रचता है और कहानी अनुभव को अपेक्षाकृत विस्तार देती है। लघुकथा एक चुने हुए बिंदु पर दृष्टि केंद्रित कर पाठक से शेष संसार की मनोगत कल्पना करवाती है। यह किसी अन्य विधा का विकल्प नहीं, रचना का अलग कलात्मक रास्ता है।
हिंदी गद्य को मितव्ययी भाषा, सार्थक संवाद और संकेत की शक्ति का नया अभ्यास भी लघुकथा ने दिया है। अच्छी लघुकथा उपदेश सुनाकर पाठक का काम पूरा नहीं करती, sवह प्रश्न छोड़ती है। इसीलिए उसका योगदान केवल सामाजिक विसंगतियाँ दिखाने तक सीमित नहीं। वह मनुष्यता, स्मृति, अकेलेपन, सह-अस्तित्व और छोटे नैतिक निर्णयों की जटिलता को भी व्यक्त कर सकती है। व्यंग्य उसका एक सशक्त औजार है, अनिवार्य स्वभाव नहीं।
प्रायः कहा जाता है कि लघु कथा में एक घटना, कम पात्र, छोटा समय, तीखा अंत और निश्चित शब्द-सीमा होनी चाहिए। ये सूत्र अभ्यास में उपयोगी हो सकते हैं, पर इन्हें अटल विधान बना देने से रचना कृत्रिम हो जाती है।
इनके अभाव में कुछ लोग लघुकथा को लघु कहानी कह देते हैं।
मेरी समझ में अधिक विश्वसनीय कसौटी है कथात्मक एकाग्रता, क्या हर वाक्य मुख्य अनुभव को आवश्यक रूप से आगे बढ़ाता है? क्या पात्र और प्रसंग जितने हैं, उतने ही चाहिए? क्या अंत से पहले की पूरी रचना उसके अर्थ को तैयार करती है?
कम शब्द होना पर्याप्त नहीं। घटना का संक्षिप्त समाचार लघुकथा नहीं बन जाता। चुटकुले का अंतिम पलटाव क्षणिक हँसी दे सकता है, जबकि लघुकथा का अंत पाठक को पहले पढ़ी बात नए अर्थ में सोचने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हर रचना में चौंकाने वाला ‘ट्विस्ट’ या स्पष्ट नैतिक शिक्षा भी अनिवार्य नहीं समझी जानी चाहिए। कभी मार्मिक मौन, कभी अप्रत्याशित संवाद और कभी बिना किसी नाटकीय घोषणा के खुली रह गई परिस्थिति अधिक प्रभावी होती है। शीर्षक अर्थ को खोल सकता है, पर उसे पूरी कथा का सारांश बनने की आवश्यकता नहीं। भाषा सहज हो, मगर सपाट नहीं, विवरण कम हों, मगर जीवन-संदर्भ अनुपस्थित न हो। लघुकथा कार के विवेक एवं शिल्प को नियमों में बांधना मेरी शैली और समझ में कम आता है।
‘एक ही समय-काल’ की अनिवार्यता पर भी व्यापक विचार ज़रूरी है। एक केंद्रित दृश्य लघुकथा के लिए अक्सर उपयोगी है, किंतु बीते समय की एक स्मृति या सीमित समय की छलाँग यदि मुख्य अनुभव को गहरा करती है, तो उसे केवल तकनीकी नियम के कारण निषिद्ध नहीं किया जा सकता। मेरे विचार में एक केंद्रीय प्रभाव अधिक सार्थक अनुशासन है, न कि घड़ी की सुइयों से बाँधी गई कथा। समय-विस्तार इतना ही हो कि रचना की सघनता बनी रहे। जहाँ कई स्वतंत्र प्रसंग और विस्तृत चरित्र-विकास आवश्यक हों, वहाँ संभव है कि विषय कहानी का आकार माँग रहा हो। रचनाकार को विधा की पहचान और कथ्य की आवश्यकता, दोनों समाझनी चाहिए।
आज लघुकथा संग्रहों, साहित्यिक पत्रिकाओं, मंचों और डिजिटल माध्यमों में निरंतर लिखी-पढ़ी जा रही है। इस प्रसार ने नए लेखकों और विविध सामाजिक अनुभवों को प्रवेश दिया है। साथ ही त्वरित प्रकाशन का दबाव अधूरी रचना, तैयारशुदा संदेश और केवल ‘आखिरी पंक्ति के झटके’ को भी बढ़ा सकता है। पाठकों की संख्या से अधिक महत्त्वपूर्ण है आलोचनात्मक पाठ, संपादन और श्रेष्ठ रचनाओं का विवेकपूर्ण चयन। क्षेत्रीय भाषिक अनुभव, स्त्री-दृष्टि, श्रमजीवी जीवन, पर्यावरण, तकनीकी बदलाव तथा हाशिये की आवाज़ें लघुकथा के कथ्य को और व्यापक बना सकती हैं।
लघुकथा की शक्ति यह नहीं कि वह कम समय में ‘खत्म’ हो जाती है। उसकी असली शक्ति यह है कि पढ़ने के बाद भी वह पाठक के भीतर चलती रहती है। हिंदी साहित्य को उसने इसी उत्तरजीवी अर्थ का एक सघन रूप दिया है। विधा को अनुशासन चाहिए, पर ऐसा अनुशासन जो अनुभव को तराशे, उसकी साँस न रोके।
-विवेक रंजन श्रीवास्तव,
लंदन प्रवास पर
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