छोटी कहानी :
श्रद्धा सुमन
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
सुबह की पहली किरण अभी आँगन में उतर ही रही थी। माँ ने स्नान कर पूजा की थाली सजाई। पीतल का छोटा-सा लोटा, अक्षत, रोली, फूल और एक दीपक। कोई त्यौहार नहीं था, फिर भी माँ के हाथों में रोज की तरह विशेष सावधानी थी।
पिता जी की तस्वीर के सामने वह कुछ देर चुप बैठीं। तस्वीर पर मुरझाया हुआ फूल धीरे से हटाया और ताजा गुलाब सजा दिया।
बेटा आफिस के लिए निकलते हुए बोला, “माँ, आज भी पिताजी के लिए पूजा कर रही हो? उन्हें गए बरसों हो गए।”
माँ मुस्कुराईं, “ बेटा... रिश्ता थोड़े ही खत्म हुआ है।”
उन्होंने दीपक जलाया। दोनों हथेलियाँ जोड़कर आँखें बंद कीं और धीरे से बोलीं, “जहाँ भी हों, खुश रहिए। यहां सब ठीक है”
बेटे की नजर पूजा की थाली पर गई, उसने
जूते उतारे , एक फूल उठाया और मां के हाथ में हाथ लेकर पिता को पुष्प अर्पित किया ।
फिर वह मुडा उसने मां के पैर छू लिए।
माँ की आँखें भर आईं।
उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखा। सामने दीपक की लौ स्थिर थी और तस्वीर पर सजे गुलाब के पास माँ की आँखों से गिरी दो बूँदें चमक रही थीं।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
Tags:
कथा कहानी
