डॉ. प्रेम नारायण सक्सेना जन्म शताब्दी : एक अनोखा समारोह
भोपाल । डॉक्टर संजय सक्सेना के पिता डॉ. प्रेम नारायण सक्सेना के जन्म शताब्दी समारोह में उपस्थित होने का सौभाग्य मिला। हृदय एक अद्भुद आनन्द से भर गया। डॉ. प्रेम नारायण सक्सेना जी कालजयी हिंदी फ़िल्मी गीतों के ख़ूब शौकीन थे। ज़ाहिर है कि महफ़िल का आगाज़ सुमधुर गीतों से ही होना था।
श्याम कृष्ण मूर्ति और संदीपा पारे ने सुमधुर फ़िल्मी गायन से महफ़िल की शुरुआत की, सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, इशारों- इशारों में दिल लेने वाले, ये दिल तुम बिन लगता नहीं,
संदीपा जी ने “आइए मेहरबाँ बैठिए जाने जान” गाकर मेहमानों का स्वागत किया। फिर राधिका मिश्रा ने संजय जी के व्यक्तित्व को निखारने वाला मधुर गीत “रंगीला रे तेरे रंग में क्यों रंगा है मेरा मन” प्रस्तुत किया।
श्याम कृष्ण मूर्ति में मेहमानों से मेहमानों से कहा “अब क्या मिसाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की, इंसान बन गई है किरण महताब की” से महफ़िल को मुकम्मिल किया।
कैलाश पंत का पुण्य स्मरण किया। सरस्वती द्वीप प्रज्वलन बाद राधिका मिश्रा “वर दे वीणा वादिनी” प्रस्तुत की। अध्यक्षता रघुनंदन शर्मा, मुख्य अतिथि विश्वास सारंग, विशिष्ट अतिथि आलोक संजर, डॉक्टर विकास दवे और डॉक्टर राजपत्र जी का स्वागत प्रेम नारायण सक्सेना और कमला सक्सेना जी की चौथी पीढ़ी ने किया।
डॉक्टर संजय ने स्वागत उद्बोधन देते हुए पिता और माता का पवन स्मरण किया। व्यक्तित्व और कृतित्व पर दो मिनिट की वीडियो क्लिपिंग प्रदर्शित की गई। साथ में डॉक्टर संजय की कमेंट्री भी चलती रही।
प्रेम नारायण एक सफल व्यक्तित्व थे। उनकी सफलता के पीछे उनकी पत्नी कमला जी का हाथ था तो कमला जी के व्यक्तित्व विकास में भी प्रेम नारायण जी का सहयोग था। इनके पुत्रों ने “प्रेम कमल” नामक एक संस्था की स्थापना की है। पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन इससे उपयुक्त अवसर नहीं हो सकता।
पैदायशी भोपाल निवासी होने के नाते प्रेम जी हॉकी प्रेमी थे और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते थे, वही प्रवृत्ति उन्होंने बच्चों में विकसित की थी।
प्रेम जी की आरंभिक पढ़ाई अलेक्जेंड्रिया हाई स्कूल में हुई। दस वर्ष में उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। प्रेम जी के दादा जी भोपाल रियासत में मुलाजिम थे। प्रेम जी को पढ़ाई हेतु वज़ीफ़ा मिलता था। पढ़ने की ललक इतनी थी कि उन्होंने भोपाल से बहुत दूर बिट्स पिलानी से ग्रेजुएट और आगरा विश्वविद्यालय से पोस्टग्रेजुएट किया था। उस ज़माने में घर से इतनी दूर निकलना दूभर था। 1944 में बी कॉम करने बिरला कॉलेज पिलानी पहुँचे। आज़ादी के दौरान छह महीने फँसे रहे फिर आगरा विश्वविद्यालय से पोस्टग्रेजुएट किया।
इस अवसर पर प्रेम जी की पोती तनुश्री नरोंहा में दादा के बारे बोलते हुए द्रवित कर दिया। उन्होंने कहा कि दादा जी कड़क आवाज में बोलते थे मगर उनकी नज़रों का अनुशासन सबसे प्रभावी होता था। वे शिक्षा और संस्कार पर कोई समझौता पसंद नहीं करते थे। सुबह पाँच बजे बच्चों को बिस्तर छोड़ना होता था। मौसम कोई भी हो स्टडी टेबल पर ही पढ़ाई का दस्तूर था।
डॉक्टर सुरेंद्र बिहारी गोस्वामी का उद्बोधन ने प्रेम जी के व्यक्तित्व के शिक्षाविद राज खोले की किस तरफ़ गोस्वामी जी ने पीएचडी करने के लिए उनका चयन किया था और फिर किस तरफ़ उनका शोध ग्रन्थ 45-44-48 के चक्रव्यूह को भेद विजयी हुआ था। यानी प्रेम जी ने शोध को 50 में से 45 अंक दिए। अगर दूसरे परीक्षक इससे अधिक अंक दे देते तो शोध कार्य पूर्ण हो जाता लेकिन शिक्षा जगत में चलती राजनीति के वशीभूत दूसरे परीक्षक ने 44 अंक कर दिए। शोध इतना उत्तम था कि उससे कम अंक नहीं किए जा सकते थे। लिहाजा तीसरे परीक्षक के पास शोध भेजना पड़ा।
महेश सक्सेना उन दिनों प्रेम जी के मकान में किरायेदार की हैसियत से रहते थे। उन्होंने अपने उद्बोधन में उस दौर के वातावरण और प्रेम जिनके अंतरंग और बहिरंग व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।
इस अनोखे कार्यक्रम में शतायु कवि यतीन्द्र नाथ राही, शतायु की दहलीज़ पर जगदीश कौशल, घनश्याम सक्सेना, महेश श्रीवास्तव, नरेंद्र दीपक, मयंक श्रीवास्तव, डॉक्टर गौरी शंकर गौरीश, डॉक्टर राजश्री रावत, प्रेम भारतीय, बालमुकुंद भारतीय जी का सम्मान किया गया।
इस अवसर पर राहुल नरोंहा जी से हुआ, वे इंडिया टुडे में कार्यरत हैं। संजय जी के दामाद राहुल नरोंहा, जिनका विवाह उनकी बेटी तनुश्री से हुआ है, उनके दी बेटे उदय और अदम्य हैं। राहुल नरोंहा मध्यप्रदेश के पहले चीफ सेक्रेटरी आर. सी. वी. पी. नरोंहा के पोते हैं। उनकी कार्यशैली में अनुशासन और स्पष्टवादिता प्रमुख थे। वे प्रशासनिक व्यवस्था में जिम्मेदारी, समयबद्धता और नियमों के पालन को महत्त्व देते थे। साथ ही, उनके संस्मरणों में तत्कालीन शासन-व्यवस्था की सीमाओं और बदलते राजनीतिक परिवेश पर आत्मालोचनात्मक दृष्टि भी दिखाई देती है। उनकी लिखी पुस्तक “Tale Told by an Idiot” सर्वकालिक लोकप्रिय किताब है।
नरोंहा की यह आत्मकथात्मक पुस्तक उनके प्रशासनिक जीवन के अनुभवों का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें तत्कालीन मध्य भारत और मध्य प्रदेश के प्रशासन, ग्रामीण समाज, आदिवासी अंचलों, राजनीतिक परिवर्तन तथा सरकारी सेवा की चुनौतियों से जुड़े संस्मरण हैं।
दूसरी चौंकाने वाली थी संजय जी के पुत्र आदित्य सक्सेना और उनकी पूजा सक्सेना से। पूजा जी अमेरिकन हैं। उनका मूल नाम एथिना है। उनके पुत्र डोमाउट्र और पुत्री डोरियन हैं।
उनके परिवार के सदस्यों ने उन फ़िल्मी गीतों को प्रस्तुत किया जो प्रेम जी को पसंद थे। 1944 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म 'रतन' में संगीत नौशाद ने दिया था और इसके सभी 10 गीत डी. एन. मदहोक ने लिखे थे। इन प्रसिद्ध गीतों में "अँखियां मिला के जिया भरमा के", "रुमझुम बरसे बदरवा", और "सावन के बादलों तुमसे गुज़ारिश है" जैसे यादगार गाने शामिल हैं, जिन्हें ज़ोहराबाई अम्बालेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी और करन दीवान जैसे कलाकारों ने गाया था। इन गीतों की प्रस्तुति ने मेहमानों का मन मोह लिया।
“ओ जाने वाले बालमवा लौट के आ” की अभिनय युक्त नृत्य प्रस्तुति ने तो भाव विभोर कर दिया।
अंत में प्रेम जी के शिष्यों ने प्रेम जी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं पर रोशनी डाली।
यह जान कर कि शिक्षा-संस्कार-अनुशासन को समर्पित एक मस्तिष्क से सजग और हृदय से आनंदित व्यक्तित्व प्रेम जी संपूर्णता से जीवन जीते और परिवार की समृद्धि को धृणप्रतिज्ञ थे। वे परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य बोध से भरे। ये सारे संस्कार उनकी अगली पीढ़ियों में भी अंतरित हुए।
डॉक्टर संजय ने माता-पिता की स्मृतियों को कमरों की हर चीज में और संगीत की मधुर धुनों में जीवंत रखा है। वयोवृद्ध इनसे जीवन की प्रेरणा ले सकते और जीने के तरीके सीख सकते हैं। डॉक्टर संजय की एक बड़ी खूबी उनकी चिकित्सा को लेकर समझ है जिसे अब वे व्यवसाय के लिए नहीं अपितु लोक कल्याण हेतु प्रयोग करते हैं। एक सार्थक जीवन जीना इनसे सीखा जा सकता है।
इनकी प्रेम कहानी भी अद्भुद है। प्रेम में डूबे तुलसीदास तो रत्नावली के पास से खाली हाथ लौट आए थे पर ये अपनी कुसुम को ह्रदय की पोरों से रेशमी छुअन से साधे हुए हैं। हैरत होती है कोई इंसान किसी को इतना प्यार कैसे कर सकता है? इस तरह का प्रेम पूजा हो जाता है। जिसमें आराध्य, आराधना और पुजारी एक ही भाव में डूबे रहते हैं।
रिपोर्ट – सुरेश पटवा
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