काव्य :
आया करवाचौथ
आया करवाचौथ फिर,लेकर ढेरों प्यार।
प्रेम समर्पण साधना,का अनुपम उपहार।
प्रेम समर्पण भाव ले,आया यह त्योहार।
भरने जीवन में खुशी,बरसाने रसधार।
रखकर करवाचौथ व्रत,होती वधु बलिहार।
करती सजना के लिए,सजनी बहु शृंगार।
पति पत्नी का प्रेम ही,है जग का आधार।
पाने को यह मान वधु,लड़ती हर यलगार।
पति की रक्षा के लिए,करती वह उपवास।
लड़ जाती यमराज से,पाने को पति श्वास।
आया करवाचौथ व्रत,लेकर नव उल्लास।
पति पत्नी के बीच में,उपजाने मृदु हास।
रखकर करवाचौथ व्रत,कर सोलह शृंगार।
पिया मिलन को कामिनी,करती शशि मनुहार।
करती नभ के चांद से,विनती वह शत बार।
चमके उसका चांद भी,हर रजनी हर वार। '
दीपक' इस त्योहार पर,दो पत्नी को दान।
पा इसको गृह लक्ष्मी,साधे चिर मुस्कान।
- रजनीश मिश्र 'दीपक' खुटार शाहजहांपुर उप्र
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