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लघुकथा: खुशियों का हिसाब - डॉ. रीटा अरोड़ा , करनाल


लघुकथा : 

खुशियों का हिसाब

“मम्मी, आज हम सब साथ खाना खाएँगे न?” बेटी ने पूछा।

“हाँ बेटा, बस पापा की मीटिंग खत्म हो जाए।”

“कल भी तो यही कहा था।”

माँ मुस्कुराईं, “पापा इतनी मेहनत तुम्हारे अच्छे भविष्य के लिए ही तो करते हैं।”

“लेकिन मम्मी, मेरा आज भी तो है!”

माँ कुछ कहतीं, तभी पापा कमरे में आ गए।

“क्या बातें हो रही हैं?”

“पापा, अगले महीने फिर बाहर जा रहे हो?”

“हाँ बेटा, प्रमोशन के लिए मेहनत करनी पड़ती है।”

“फिर प्रमोशन के बाद हमारे साथ खेलोगे?”

“बिल्कुल!”

“पिछले प्रमोशन पर भी यही कहा था।”

पापा निरुत्तर हो गए।

बेटी ने धीरे से पूछा, “पापा, आप इतना काम कब तक करोगे?”

“जब तक तुम्हारे लिए सब कुछ नहीं जुटा देता।”

बेटी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“पापा, मुझे सब कुछ नहीं चाहिए... बस कभी-कभी आप भी चाहिए।”

पापा ने पहली बार अपनी घड़ी उतारकर मेज़ पर रख दी।

उस शाम समय वही था, लेकिन उसकी कीमत बदल गई थी।

- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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