काव्य :
ठोकर बहुत जरूरी
बिन अनुभव के अपनी जिंदगी,
रहती सदा अधूरी है।
अगर संभालना है जीवन में,
ठोकर एक जरूरी है।।
संघर्षों से लड़कर प्राणी,
एक सांसे में ढलता है।
एक ठोकर को खा करके,
संभल संभलकर चलता है।।
जीवन है संघर्ष तुम्हारा,
इससे तुम घबराना मत।
आगे बढ़ते ही जाना है,
लौट कभी तुम आना मत।।
ठोकर खाकर हिम्मत करके,
आगे बढ़ता जाएगा।
रास्ता होगी सुलभ तुम्हारी,
तू मंजिल को पाएगा।।
बड़ा स्वार्थी आज जमाना,
नहीं किसी के पास है हल।
चाहे भला अगर तू अपना,
बंदे संभल संभलकर चल।।
सब कुछ साधारण हो जाता,
जब घड़ी सुहानी आती है।
कह विलगैया ठोकर हमको,
चलना सदा सिखाती है।।
- रविशंकर बिलगैया , पृथ्वीपुर
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