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व्यंग्य : दशहरे पर दशानन का आभार प्रदर्शन - देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल


व्यंग्य : 

दशहरे पर दशानन का आभार प्रदर्शन

        - देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल

                 हमारे देश में प्रतिवर्ष दशहरे पर दशानन के दहन की परम्परा है । प्रतीकात्मक रूप से की जाने वाली इस परम्परा ने अब उत्सव का रूप ले लिया है । आयोजन समितियों के बीच तो अब रावण के पुतले को लेकर जो प्रतिस्पर्द्धा देखी जा रही है वह आश्चर्यजनक है । रावण यह सब देखकर प्रसन्न क्यों नहीं होगा? उसने पृथ्वी पर विशेषकर भारतवासियों के प्रति इन शब्दों में आभार व्यक्त किया है । मित्रों, आप सब मिलकर प्रतिवर्ष दशहरे पर मेरा पुतला दहन करते हो इससे मुझे किंचित भी बुराई नहीं है, बल्कि मुझे तो इस बात की बेहद खुशी है कि इस बहाने आप मेरे पुतलों के आकार-प्रकार में निरन्तर वृद्धि करते जा रहे हैं  । साथियों, त्रेतायुग में राम के द्वारा मेरा वध करने के पश्चात् तो मैंने सोच लिया था कि दुनिया से मेरा नामोनिशान ही मिट जायेगा । किन्तु आप भारतवासियों ने तो आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर मेरा कद इतना बढ़ा दिया है कि उसके आगे तो सभी बौने लगने लगे हैं । अतः, यदि यही हाल रहा तो लगता है कि मेरा वह सपना स्वर्ग तक सीढ़ियाँ बनाने का, जो अधूरा रह गया था उसे मेरी पुतला दहन समितियाँ एक न एक दिन मेरा कद आसमान तक बढ़ाकर साकार कर देंगी । मैं इसके लिये सर्वप्रथम सभी समितियों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ । साथियों मुझे यह भी पता चला है कि मेरे पुतला दहन की परम्परा का प्रयोग अब राजनीति में भी किया जाने लगा है तथा यह भी माना जाता है कि, जिस नेता का जितनी बार पुतला दहन किया जाता है वह उतना ही दमदार सिद्ध होता है । मित्रों मैंने भी तो ऐसी ही दमदारी त्रेतायुग में दिखाई थी । वर्तमान के राजनीतिज्ञ मेरा अनुसरण कर रहे हैं ये मेरी प्रसन्नता का विषय है । यह सब देख-सुनकर तो मुझे लगता है कि भविष्य में राजनीति, रावण नीति के रूप में जानी जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । मैं इस अवसर पर अपने जात भाइयों का भी विशेष आभार प्रकट करना चाहूँगा जो तुलसी बाबा के बहकावे में नहीं आये हैं । अन्यथा तुलसी बाबा ने तो 'मोह जनित संशय सब हरना' कहकर इन ब्राह्मणों को उकसाया था कि इनका मुख्य कार्य तो  मोह अर्थात आज्ञान  को दूर करना है ताकि मेरे अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया जाए  और इनकी वंदना करते हुए इन्हें महीसुर  अर्थात पृथ्वी के देवता कहकर भी चने के झाड़ पर चढ़ाने का प्रयास किया था ,पर मैं देख रहा हूँ कि इन ब्राह्मणों में कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने संशय करना तो दूर इस विषय में इनका परस्पर इतना मतभेद है कि ये अज्ञान दूर करने के बजाय एक-दूसरे से ही दूरी बनाए हुए हैं । आज इनकी कृपा से ही जीवन के हर क्षेत्र में मोह याने अज्ञान जिन्दा बना हुआ है । जरा सोचिये यदि मेरे जात भाई अपने इस दायित्व का भली-भाँति निर्वाहन करते तो मेरा क्या होता ? मैं इसी संदर्भ में वर्तमान के ऐसे साधुओं का भी आभारी हूँ जो अपने असली रूप को मेरी ही तरह छुपाने में माहिर हो गये हैं तथा इनके कारण समाज से साधुओं की प्रतिष्ठा कम होती जा रही है । अन्यथा ये तो राम का नाम लेकर मेरा अस्तित्व ही समाप्त कर देते । मुझे तो उन कथावाचकों को देखकर भी प्रसन्नता होती है, जिनकी कथाओं में कथा कम, फ़िल्मी ऑर्केस्ट्रा ज्यादा सुनाई पड़ता है । इस आधुनिक काल के कवियों ने तो मेरे हित में एक काम और अच्छा किया है कि कवि सम्मेलनों के माध्यम से ये न केवल फुहड़ हास्य कविताएं सुनाते हैं, बल्कि इनके प्रयास से श्रोताओं को भक्ति के गीतों से पूरी तरह दूर किया जा रहा है । इससे तो मेरा मार्ग और सुलभ हो गया है । मुझे लगता है कि धीरे-धीरे तुलसी, मीरा, रसखान और कबीर जैसे संतों के भजनों की जगह ये फिल्मी गीत ले लेंगे और कथाओं का स्वरूप भी इतना बिगड़ जायेगा इसकी तो कल्पना ही नहीं की थी ,इसलिए मैं  इन कवियों के प्रति भी आभार प्रकट करना चाहूँगा, जिनकी कविताओं में काम की प्रधानता होती है । तब इनके, राम के निकट जाने का कोई खतरा मुझे नहीं लगता । वैचारिक धरातल पर तो ये मेरी ही प्रतिष्ठा कर रहे हैं ऐसा मैं मानता हूँ । मैं इसी संदर्भ में उन फिल्म निर्माता-निर्देशकों का भी आभार मानता हूँ जो फिल्मों के माध्यम से अश्लीलता, हिंसा का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं । इनके कारण नयी पीढ़ी का ज्ञान-ध्यान से कोई संबंध नहीं रह गया है । मुझे विश्वास है कि भले ही नयी पीढ़ी ने मेरे बारे में कुछ पढ़ा-लिखा नहीं हो, लेकिन अप्रत्यक्षतः यह सब देख-सुनकर मेरा ही अनुसरण करेंगे । ऐसी मुझे आशा है । अभी-अभी हनुमान अंश जैसी फ़िल्म ने जनमानस में मेरे विरुद्ध (या चरित्र के प्रति) जनमत बनाने का  प्रयास किया है । इससे मुझे थोड़ा भय तो लगा है, लेकिन मैं जानता हूँ कि ऐसा श्मशानी वैराग्य अधिक दिनों तक टिक नहीं पाएगा ,ऐसा मेरा अनुभव है । मैं उन सभी का हृदय से आभार प्रकट करना चाहूँगा जो मेरे पुतला दहन के कार्यक्रम में तो सम्मिलित होते रहते हैं, और अपने भीतर मेरे दूसरे रूप अज्ञान के  अस्तित्व को बनाये हुये हैं । अंत में मेरा अनुसरण करने के कारण आप सभी के प्रति ह्रदय से आभार ।

आपका अपना  

     दशानन

 

 

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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