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गुरु-भक्ति, प्रार्थना और आत्मकल्याण का मार्ग बताते हैं संतों के उपदेश



गुरु-भक्ति, प्रार्थना और आत्मकल्याण का मार्ग बताते हैं संतों के उपदेश

सागर की तरह सबको स्वीकार करते हैं संत, उनके ज्ञान से मिटता है अज्ञान रूपी अंधकार

इटारसी। संतों के उपदेश मनुष्य को आत्मकल्याण, संयम और प्रभु-भक्ति का मार्ग दिखाते हैं। सागर में नदी गिरे या नाला, वह सभी को अपने भीतर समाहित कर लेता है। ठीक इसी प्रकार मुनिराज के पास कोई धर्मात्मा आए या पापी, वे सभी को स्वीकार करते हैं और उन्हें सही मार्ग दिखाने का प्रयास करते हैं। इसी विशाल हृदय और उदारता के कारण जैन मुनियों के नाम के साथ सागर शब्द जुड़ा होता है, जैसे ज्ञान सागर, विद्यासागर और समय सागर। संत सागर की तरह विशाल होते हैं और उनके सान्निध्य में आने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करता है।
यह उद्गार जैन आर्यिका संघ प्रमुख भावनामति ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा, 
दीपक अंधकार में प्रकाश देता है, जबकि संत समाज को ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। दीपक की रोशनी बाहरी अंधकार मिटाती है, वहीं संतों के उपदेश मनुष्य के भीतर के अज्ञान और विकारों को दूर करते हैं। गुरु के मुख से निकला उपदेश जीवन को सही दिशा देता है। दर्पण हमें हमारा बाहरी रूप दिखाता है, जबकि आचार्य श्री हमें अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं।

भक्ति केवल बाहरी त्याग नहीं, आंतरिक वैराग्य भी है। जिस प्रकार गंगा को गंगासागर तक पहुंचने के लिए विभिन्न स्थानों से होकर गुजरना पड़ता है, उसी प्रकार आत्मा को परमात्मा बनने के लिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र को धारण करना आवश्यक है। भगवान महावीर जैसे महापुरुष को भी केवलज्ञान की प्राप्ति के लिए वर्षों तक साधना करनी पड़ी। जब महापुरुषों को साधना में इतना समय लगता है, तो हमें भी आत्मकल्याण के मार्ग पर निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। भले ही मंजिल तक पहुंचने में समय लगे, लेकिन प्रत्येक कदम हमें लक्ष्य के निकट ले जाता है।

आर्यिका भावनामति ने कहा, जिस प्रकार सांस, भूख और नींद का अनुभव होता है, लेकिन उन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखा नहीं जा सकता, उसी प्रकार परमात्मा को भी केवल बाहरी आंखों से देखने के बजाय हृदय से अनुभव करने की आवश्यकता है। परमात्मा को बाहर खोजने से पहले अपने भीतर तलाशना चाहिए। जैसे दूध में घी दिखाई नहीं देता, लेकिन उचित प्रक्रिया से उसे प्राप्त किया जा सकता है, वैसे ही साधना और आत्मचिंतन के माध्यम से आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव किया जा सकता है।

संसार में रहें, लेकिन संसार को मन में न बसने दें

गुरु-भक्ति का महत्व समझाते हुए कहा गया कि नाव पानी में रहती है और लोगों को नदी पार कराती है, लेकिन जब तक पानी नाव के भीतर नहीं भरता, वह डूबती नहीं है। इसी प्रकार मनुष्य को संसार में रहते हुए भी संसार के विकारों को अपने मन में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। नाव में पानी भर जाए तो नाव के साथ उसमें बैठे लोग भी डूब सकते हैं। कमल कीचड़ में खिलता है, लेकिन कीचड़ उसके ऊपर नहीं चढ़ता। मनुष्य को भी कमल की तरह संसार में रहकर निर्मल बने रहना चाहिए।

जीवन में अनावश्यक ज्ञान की उलझनों में पड़ने के बजाय उसकी सार्थक बातों को अपनाना चाहिए। प्रभु का नाम स्मरण करना, मन को एकाग्र रखना और अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाना ही सच्ची साधना है। संसार में प्रतिष्ठा पाने की इच्छा रखने के बजाय प्रभु के नाम में मन लगाना चाहिए। जब मनुष्य का जीवन सदाचार, विनम्रता और भक्ति से जुड़ जाता है, तो उसका व्यक्तित्व स्वयं ही दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है।

संतों की वाणी का सार यही है कि मनुष्य निरंतर पुरुषार्थ करे, अहंकार का त्याग करे, प्रभु का स्मरण बनाए रखे और संसार में रहते हुए भी अपने मन को विकारों से बचाए। यही आत्मकल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।


शरद पूर्णिमा पर होगा विद्या गुरु विधान

इटारसी। कावेरी इस्टेट स्थित श्री आदिनाथ मंदिर में आर्यिका भावनामति माताजी के सान्निध्य में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के जन्मोत्सव एवं संयम पर्व  
शरद पूर्णिमा पर दो दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम होगा। 

कार्यक्रम की शुरुआत रविवार, 25 अक्टूबर को प्रातः भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ होगी।  सुबह 8 बजे से विद्या गुरु विधान का आयोजन किया जाएगा। रात्रि 7 बजे से भक्ति संगीत का कार्यक्रम होगा, जिसके साथ 48 दीपों से महाआरती की जाएगी।

सोमवार, 26 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रातः भगवान का 108 कलशों से अभिषेक एवं शांतिधारा की जाएगी। आर्यिका ससंघ ने धर्मावलंबियों से अपने-अपने घरों में 5-5 दीप प्रज्वलित करने और जरूरतमंदों को दान देने का आग्रह किया है। 

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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