यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना में राष्ट्रीयता और लोक-संवेदना
-विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
राष्ट्रीयता केवल भौगोलिक सीमाओं, कोरे अतीत के गौरव या सतही उत्सवधर्मी उद्घोषों से अधिक उस देश के जनजीवन, सांस्कृतिक स्मृतियों, सामाजिक आकांक्षाओं और सामूहिक भविष्य के प्रति पूरी तरह सजग रहना है।
हिंदी नवगीत की सशक्त परंपरा के हस्ताक्षर यतींद्रनाथ राही की काव्य चेतना इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में आकार लेती है। उनके गीत केवल निजी भावनाओं की सुकुमार अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने समय की विसंगतियों, व्यवस्था की नब्ज़ और मनुष्य की जिजीविषा को स्वर देते हैं। उनके राष्ट्रीयता के स्वर राष्ट्रप्रेम के भावुक धरातल से आगे बढ़कर एक प्रखर 'राष्ट्रबोध' और सामाजिक उत्तरदायित्व में दृष्टव्य है।
इस राष्ट्रबोध का तीखा और जीवंत रूप उनकी बहुचर्चित रचना ‘आ रहा है ज्वार देखो!’ में उभरता है। कविता का आरंभ ही पाठक को सतही दृश्यों से परे देखने की चेतावनी देता है, जब कवि आगाह करता है कि “लहर की अठखेलियों पर भूल मत जाओ हक़ीक़त है अभी सोया समुन्दर आ रहा है ज्वार देखो!”।
यहाँ समुद्र और ज्वार महज़ प्राकृतिक उपादान नहीं हैं, बल्कि यह उस जनमानस की अदम्य ऊर्जा और परिवर्तन की संभावना का प्रतीक हैं जिसे सत्ताएँ अक्सर निष्क्रिय मान लेती हैं। इसी क्रम में, कविता जब यह व्यंग्य कसती है कि “नाम सेवा का लिया था मिल गयी जागीरदारी”, तो वह सीधे तौर पर उन विडंबनाओं को बेनकाब करती है जहाँ जनसेवा का पाखंड विशेषाधिकारों और सत्ता-सुख में बदल जाता है। राही की राष्ट्रीय चेतना का आधार अंधसमर्थन कतई नहीं है । उनकी निष्ठा हमेशा सत्ता के बजाय जनहित के साथ है, जो तंत्र को उसके मूल उत्तरदायित्व का स्मरण कराती है। संकट और धुएँ के अंधेरे के बीच ज्वार का यह रूपक इस बात का प्रमाण है कि उनकी कविता निराशा का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत संकटों से जूझने की सामूहिक जिजीविषा का दस्तावेज है।
किंतु राष्ट्र केवल राजनीतिक तंत्र या इतिहास की सीमाओं तक सीमित नहीं होता। उसकी वास्तविक और जीवंत आत्मा गाँवों, कस्बों, लोकभाषाओं, श्रम-संस्कृति और पीढ़ियों से संचित स्मृतियों में बसती है। राही की कविता ‘यादें’ इस सांस्कृतिक आयाम को बेहद आत्मीयता से उजागर करती है। अमराइयों, चौपालों, घरेलू लोकाचार और खेतों-मेड़ों के दृश्य केवल अतीत के सुंदर चित्र भर नहीं हैं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक संसार के पुनर्सृजन हैं जिसने भारतीय समाज को सींचा है। भारत की बहुलता ही उसकी शक्ति है। अलग-अलग बोलियाँ, रीति-रिवाज और जीवन-पद्धतियाँ मिलकर राष्ट्रीय संस्कृति का ताना-बाना बुनती हैं। राही की कविता में अतीत की स्मृति और वर्तमान की चुनौती के बीच एक सुंदर संतुलन दिखाई देता है। स्मृति मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़े रखती है, जबकि वर्तमान उसे समकालीन विडंबनाओं से टकराने की शक्ति देता है।
इसी वैचारिक स्वायत्तता को उनकी एक अन्य रचना ‘भोगा और जिया’ और अधिक स्पष्ट करती है। परंपरा का अर्थ उनके लिए पुराने मूल्यों का अंधानुकरण करना नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से गुजरकर उन्हें नए संदर्भों में परखना है। आधुनिकता का आशय भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाना नहीं है। इसी प्रसंग में उनकी यह पंक्ति अत्यंत गहरी दृष्टि रखती है—
“किसी ध्वजा की छत्र-छाँव में रथ यह नहीं रुका है।” यह एक स्वतंत्र रचनाकार का उद्घोष है जो किसी एक संकीर्ण राजनीतिक आग्रह या वैचारिक दबाव के आगे अपनी विवेकशीलता और आलोचनात्मक दृष्टि का समर्पण नहीं करता। लोकतांत्रिक समाज में असहमति, सवाल पूछना और संवाद करना ही राष्ट्र को जीवंत रखता है।
शिल्प के स्तर पर भी राही के नवगीत इस वैचारिक गहराई को अत्यंत प्रभावी बनाते हैं। लंबी बहसों या नारों के स्थान पर वे आग, धुआँ, क्षितिज, समुद्र और लोक-स्मृतियों के सघन बिंबों का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जो सीधे पाठक की संवेदना को झकझोरता है।
यतींद्रनाथ राही का काव्य हमें यह बताता है कि राष्ट्र से सच्चा प्रेम करना केवल उसकी जय-जयकार करना मात्र नहीं होता, बल्कि उसकी वास्तविकताओं को पहचानना, उसकी सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना, व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाना और उसके बेहतर भविष्य के प्रति ईमानदार रहना है। उनकी राष्ट्रीय चेतना संकीर्णता से मुक्त होकर मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय के विशाल फलक पर सार्थक होती है।
-विवेक रंजन श्रीवास्तव
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