लघुकथा :
जीभ और दाँत
गाँव की साँझ थी। नीम के नीचे दादाजी चारपाई पर बैठे थे। पास ही पोता खेल रहा था।
“बेटा, जानता है, बुढ़ापे में दाँत गिर जाते हैं, मगर जीभ आख़िर तक साथ रहती है?”
“क्यों दादाजी?”
“दाँत कठोर होते हैं, जीभ कोमल। जो अकड़ता है, टूट जाता है... जो झुकता है, बच जाता है।”
“दादी भी ऐसी थीं?”
दादाजी कुछ देर चुप रहे।
“हाँ बेटा। मैं ज़रा-सी बात पर डाँट देता। वह चुपचाप रोटी सेंकती रहतीं।”
“उन्हें गुस्सा नहीं आता था?”
“आता होगा... मैंने कभी पूछा ही नहीं।”
“फिर दादी ने बोलना क्यों छोड़ दिया?”
“पहले बहुत बातें करती थीं। खेतों की, बच्चों की, अपने सपनों की। धीरे-धीरे बस ज़रूरत भर बोलने लगीं।”
“आपको बुरा नहीं लगा?”
“तब लगा, घर में शांति हो गई है।”
“और अब?”
“अब समझ आया... **घर शांत नहीं हुआ था, तेरी दादी ने अपने मन की आवाज़ दबा ली थी।**”
“आपने कभी उन्हें मनाया नहीं?”
“एक बार पूछा था, क्या हुआ? बोलीं, कुछ नहीं। मैं भी मान गया।”
“फिर?”
“फिर उन्होंने कभी कुछ बताया ही नहीं।”
पोता खेलने चला गया।
दादाजी की नज़र खाली चारपाई पर टिक गई।
शाम की चाय आई। उन्होंने आदतन पुकारा—
“सुनती हो, चाय ठंडी हो रही है...”
फिर अचानक चुप हो गए।
कुछ देर बाद उठे और अलमारी से दादी की पुरानी डायरी निकाल लाए।
पहला पन्ना खोला।
उस पर लिखा था-
*“आज फिर बहुत कुछ कहना चाहती थी, लेकिन...”*
दादाजी की उँगलियाँ वहीं ठहर गईं।
*बाहर नीम के पत्ते सरसराते रहे... और डायरी का अगला पन्ना अब भी बंद था।*
- डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल
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कथा कहानी
