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ललित आलेख : आँचल- विवेक रंजन श्रीवास्तव , दुबई


ललित आलेख : 

आँचल

- विवेक रंजन श्रीवास्तव

आँचल! एक छोटा सा शब्द, किंतु अपने भीतर भावनाओं का कितना विशाल संसार समेटे हुए है। यह  ममता, संस्कार और संस्कृति का स्नेहिल विस्तार है ।साड़ी का वह छोर , जिसे स्त्री अपने कंधे पर सहजता से सँभालती है। यह उसकी  ममता का विस्तार है, वात्सल्य की छाया है, संस्कारों की पाठशाला है और संस्कृति की वह जीवंत धरोहर है, जिसमें पीढ़ियों का अनुभव, परिवार की आत्मीयता और समाज की संवेदनाएँ सुरक्षित रहती हैं। आँचल का स्मरण होते ही आँखों के सामने माँ की एक ऐसी छवि उभरती है, जिसके पास संसार की हर समस्या का समाधान भले न हो, लेकिन जिसके आँचल में सिर छिपा लेने मात्र से हर पीड़ा कुछ हल्की हो जाती है।

भारतीय जीवन में आँचल का अर्थ कभी केवल वस्त्र का एक हिस्सा नहीं रहा। यह भावनात्मक सुरक्षा का प्रतीक बनकर हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक मानस में रचा बसा शब्द है। बच्चा जब पहली बार संसार को पहचानता है, तब उसकी पहली परिचित दुनिया माँ का चेहरा और उसका आँचल ही होती है। भूख लगने पर आँचल की ओट, नींद आने पर उसी का स्पर्श, रोने पर उसी से पोंछे गए आँसू और डर लगने पर उसी में छिप जाने का सुख।
शोध बताते हैं कि बहुत नन्हा शिशु भी मां के आंचल की गंध पहचानता है, इसीलिए किसी अपरिचित की गोद में रोता शिशु मां के आंचल में आते ही शांत हो जाता है।
 बचपन की स्मृतियों में आँचल एक ऐसा घर है, जिसकी कोई दीवार नहीं, कोई दरवाजा नहीं, फिर भी वहाँ सुरक्षा की परम अनुभूति होती है।

माँ के आँचल में केवल स्नेह नहीं होता, जीवन के आरंभिक संस्कार भी होते हैं। बच्चा बोलना सीखता है तो माँ की भाषा से, चलना सीखता है तो उसकी उँगली पकड़कर और अच्छे बुरे का अंतर समझता है तो उसके व्यवहार को देखकर। माँ की लोरी, उसकी कहानियाँ, पूजा के समय सुनाई देने वाले मंत्र, त्योहारों की तैयारियाँ और परिवार के बुजुर्गों के प्रति सम्मान का व्यवहार, ये सब बच्चे के मन में अनजाने ही संस्कारों के बीज बोते रहते हैं। इस अर्थ में आँचल किसी औपचारिक विद्यालय से कम नहीं है। यहाँ पाठ्यपुस्तकें नहीं होतीं, लेकिन जीवन का पाठ पढ़ाया जाता है। यहाँ परीक्षा नहीं होती, लेकिन व्यवहार में सीखे गए संस्कार जीवन भर मनुष्य की परीक्षा लेते रहते हैं।

हमारे लोकजीवन में आँचल से जुड़ी अनेक स्मृतियाँ और परंपराएँ हैं। कहीं माँ बच्चे को धूप से बचाने के लिए आँचल की छाया कर देती है, कहीं खेत से लौटते समय उसी में फल और अनाज की छोटी सी पोटली बाँध लाती है। कहीं उसमें घर के मंदिर का प्रसाद होता है, कहीं बच्चों के लिए छिपाकर रखी गई मिठाई। ग्रामीण जीवन में स्त्री का आँचल मानो चलता फिरता भंडार गृह रहा है। उसमें आवश्यकता की छोटी छोटी वस्तुएँ भी मिल जाती थीं और अवसर आने पर वही आँचल किसी की आँखों के आँसू पोंछने का साधन भी बन जाता था। वस्त्र का यह साधारण हिस्सा जीवन की असाधारण आत्मीयता का वाहक बन गया।

भारतीय लोकगीतों में आँचल का उल्लेख विशेष आत्मीयता के साथ मिलता है। बेटी की विदाई के समय माँ का आँचल भीग जाता है। बहन की राखी में भाई के प्रति स्नेह और मंगलकामना जुड़ जाती है। नववधू जब पहली बार ससुराल आती है तो उसका घूँघट और आँचल नए परिवार में उसके प्रवेश की सांस्कृतिक छवि बनते हैं। कहीं आँचल में अक्षत रखे जाते हैं, कहीं फूल, कहीं नारियल और कहीं शुभकामनाओं का प्रतीक माना जाने वाला चावल। पूजा और मांगलिक अवसरों पर आँचल का उपयोग केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण की अभिव्यक्ति भी है।

हमारी संस्कृति में अन्नपूर्णा का भाव भी आँचल से जुड़ता है। खेतों में श्रम करती स्त्री, घर में चूल्हा सँभालती माँ और परिवार के लिए भोजन जुटाती गृहिणी, इन सबके बीच आँचल एक मौन सहभागी की तरह उपस्थित रहता है। वह श्रम की गरिमा का भी प्रतीक है। आँचल में अनाज की बालियाँ समेटती किसान स्त्री हो या बच्चे के लिए रोटी का टुकड़ा बचाकर रखती माँ, दोनों के भीतर एक ही भाव सक्रिय है, अपने से पहले अपनों की चिंता।

समय के साथ आँचल के अर्थ और उपयोग में परिवर्तन आया है, लेकिन उसका भावनात्मक महत्व समाप्त नहीं हुआ। पहले संयुक्त परिवारों में दादी और नानी के आँचल से कहानियाँ, लोककथाएँ और जीवन के अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुँचते थे। बच्चे उनके पास बैठकर राजा रानी, परियों, पंचतंत्र और रामायण महाभारत के प्रसंग सुनते थे। इन कहानियों में मनोरंजन के साथ जीवन के मूल्य भी छिपे रहते थे। सत्य बोलना, बड़ों का सम्मान करना, जरूरतमंद की सहायता करना, प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखना, ये सब बातें बच्चों को किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि कहानी के सहज प्रवाह में मिलती थीं। दादी का आँचल मानो परिवार की मौखिक परंपरा का पुस्तकालय था।

आँचल का सांस्कृतिक अर्थ केवल माँ तक सीमित नहीं है। भारतीय समाज में नारी को शक्ति, सृजन और संवेदना का प्रतीक माना गया है। दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूपों में स्त्री की शक्ति, समृद्धि और ज्ञान की आराधना होती है। हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक आख्यानों में सीता का धैर्य, यशोदा का वात्सल्य, कौशल्या की ममता और यशोदा के आँचल में पलते कृष्ण की बाल लीलाएँ आज भी जनमानस में जीवित हैं। यशोदा के आँचल में छिपकर माखन खाने वाले कृष्ण की छवि केवल धार्मिक प्रसंग नहीं, वात्सल्य रस की अनुपम सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। साहित्य और चित्रकला ने भी माँ और शिशु के इस संबंध को बार बार चित्रित किया है।

हिंदी कविता में आँचल की उपस्थिति विशेष रूप से भावपूर्ण रही है। कवियों ने इसे ममता, करुणा, आश्रय और त्याग के प्रतीक के रूप में देखा है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की नारी संवेदना हो या महादेवी वर्मा की करुणामयी अभिव्यक्ति, स्त्री का अंतर्मन और उसकी संवेदनाएँ हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। हिंदी साहित्य में आँचल शब्द केवल मातृत्व, वात्सल्य और स्त्री की भावनात्मक संवेदना का प्रतीक बनकर नहीं रहा, बल्कि उसने एक व्यापक साहित्यिक अर्थ भी अर्जित किया है। कविता, कहानी और उपन्यास में आँचल कभी माँ की ममता की छाया बनकर उपस्थित होता है, तो कभी बेटी की विदाई में भीगी स्मृति, कभी स्त्री के आत्मसम्मान और त्याग का प्रतीक, तो कभी लोकजीवन की सांस्कृतिक धरोहर का वाहक। हिंदी साहित्य में आँचल की एक विशिष्ट पहचान फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल से भी बनी। रेणु ने स्वयं इसे आँचलिक उपन्यास कहा और बिहार के पूर्णिया जनपद के मेरीगंज गाँव को कथा का केंद्र बनाया। यहाँ आँचल का अर्थ साड़ी का पल्लू नहीं, बल्कि एक भौगोलिक क्षेत्र, उसकी मिट्टी, बोली, लोकगीत, रीति रिवाज, लोकविश्वास और सामूहिक जीवन संस्कृति है। 
रेणु के बाद परती परिकथा, नागार्जुन के बलचनमा, राही मासूम रज़ा के आधा गाँव और शिवपूजन सहाय के देहाती दुनिया जैसी रचनाओं ने भी स्थानीय समाज और संस्कृति को साहित्य में विशिष्ट पहचान दी जिनमें आँचल शब्द व्यापक दृष्टि कोण में प्रयुक्त किया गया। इस प्रकार हिंदी साहित्य में आँचल दो परस्पर जुड़े अर्थों में विकसित हुआ है। एक ओर वह माँ की ममता, वात्सल्य, करुणा और आत्मीय आश्रय का भावात्मक प्रतीक है, दूसरी ओर वह किसी भूभाग की सामूहिक अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि है। यही आँचल की साहित्यिक व्यापकता है कि वह एक माँ की गोद से लेकर पूरे समाज की सांस्कृतिक गोद तक अपनी अर्थवत्ता का विस्तार करता है।

लोकगीतों में माँ के आँचल की छाया से लेकर बेटी की विदाई में उसके भीग जाने तक, आँचल जीवन के अनेक भावों का साक्षी बनता है। यह सुख में आशीर्वाद है, दुख में सहारा है और बिछोह में स्मृति का सबसे आत्मीय प्रतीक है।

आँचल का एक सुंदर पक्ष यह भी है कि वह देने की संस्कृति से जुड़ा है। माँ अपने हिस्से का निवाला बच्चे को दे देती है। दादी अपनी बचाई हुई मिठाई पोते को खिला देती है। बहन अपने भाई के लिए मंगलकामना करती है। पत्नी अपने परिवार की खुशियों में अपनी खुशियाँ खोजती है। इन सबके बीच आँचल एक ऐसे भाव का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें अपनापन किसी हिसाब किताब का मोहताज नहीं होता। शायद इसी कारण हमारे यहाँ किसी को आशीर्वाद देते समय आँचल फैलाने की परंपरा भी रही है। आँचल फैलाना याचना मात्र नहीं, अपने आराध्य के सामने श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का भाव भी है।

लेकिन आँचल की चर्चा करते हुए एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करना भी आवश्यक है। क्या ममता और त्याग का सारा दायित्व स्त्री के हिस्से ही आना चाहिए? क्या आँचल को केवल सहनशीलता और बलिदान का प्रतीक बनाकर हमने स्त्री के व्यक्तित्व के दूसरे आयामों की उपेक्षा नहीं की? परंपरा का सम्मान तभी सार्थक है, जब उसमें स्त्री की स्वतंत्रता, शिक्षा, आत्मसम्मान और निर्णय लेने के अधिकार का भी सम्मान हो। माँ का आँचल बच्चे को सुरक्षा दे, लेकिन उसी माँ के सपनों को भी उड़ान मिले। वह परिवार को संस्कार दे, लेकिन परिवार भी उसके व्यक्तित्व और आकांक्षाओं का सम्मान करे। आधुनिक समाज में आँचल की सार्थकता इसी संतुलन में है।
मैथिली शरण जी की पंक्तियां 
अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।
की प्रासंगिकता अब भले समाप्त हो गई है पर आंचल का भाव शाश्वत है।

आज का बचपन डिजिटल संसार में बड़ा हो रहा है। मोबाइल की स्क्रीन ने लोरी की जगह ले ली है। वीडियो गेम ने दादी नानी की कहानियों को पीछे धकेल दिया है। परिवार भौगोलिक रूप से दूर दूर बस गए हैं। बच्चे विदेशों में हैं, माता पिता भारत में। संवाद के साधन बढ़े हैं, लेकिन कई बार आत्मीय संवाद कम हुआ है। वीडियो कॉल पर दादी पोते को देख तो लेती हैं, लेकिन उसे अपने आँचल में समेट नहीं पातीं। फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि नई पीढ़ी के जीवन में ममता और संस्कारों के लिए जगह नहीं बची है। आवश्यकता केवल इतनी है कि परंपरा अपने अभिव्यक्ति के नए माध्यम खोजे। दादी की कहानी ऑडियो संदेश बन सकती है, माँ की लोरी वीडियो कॉल पर सुनाई जा सकती है और त्योहारों की परंपराएँ सात समंदर पार भी निभाई जा सकती हैं। आँचल का भाव भौगोलिक दूरी से समाप्त नहीं होता।

वस्तुतः संस्कृति किसी संग्रहालय में रखी हुई वस्तु नहीं है, जिसे केवल देखकर संतुष्ट हो लिया जाए। वह जीवन में व्यवहार के रूप में उतरती है। जब हम अपने बच्चों को बुजुर्गों का सम्मान करना सिखाते हैं, जब बेटी और बेटे में भेद नहीं करते, जब घर में काम करने वाले व्यक्ति को भी सम्मान देते हैं, जब प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशील होते हैं, तब हम अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाते हैं। आँचल इसी जीवन संस्कृति का प्रतीक है। वह हमें सिखाता है कि सभ्यता की ऊँचाई केवल बड़ी इमारतों, आधुनिक तकनीक और आर्थिक समृद्धि से नहीं मापी जा सकती। किसी समाज की वास्तविक समृद्धि इस बात में भी दिखाई देती है कि वहाँ मनुष्य के लिए कितना अपनापन बचा है।

आँचल अंततः एक भाव है, एक अनुभूति है, एक ऐसा अदृश्य संबंध है जो पीढ़ियों को जोड़ता है। माँ का आँचल बचपन में सुरक्षा देता है, दादी का आँचल परंपराओं से परिचित कराता है और जीवन के कठिन समय में किसी अपने का स्नेहिल स्पर्श हमें फिर से जीने का साहस देता है। उम्र बढ़ने पर भी मनुष्य के भीतर एक बच्चा जीवित रहता है, जो कभी कभी अपनी माँ को याद करता है, उसके आँचल की छाया खोजता है।

शायद इसीलिए संसार की तमाम उपलब्धियों के बाद भी मनुष्य को अंततः एक आत्मीय आश्रय की तलाश रहती है। उसे ऐसा स्थान चाहिए जहाँ वह अपनी सफलताओं का प्रदर्शन किए बिना रह सके, अपनी असफलताओं को छिपाए बिना स्वीकार कर सके और बिना किसी संकोच के अपने मन की बात कह सके। माँ का आँचल इसी निश्छल स्वीकार का नाम है।

आँचल की असली विरासत साड़ी के पल्लू में नहीं, उस ममता में है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है। वह केवल सिर ढकने या आँसू पोंछने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कारों को पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचाने वाली भावनात्मक परंपरा है। जब तक संसार में प्रेम, करुणा, वात्सल्य और अपनत्व जीवित हैं, तब तक आँचल भी जीवित रहेगा। क्योंकि आँचल अंततः वस्त्र का एक टुकड़ा नहीं, मनुष्यता की सबसे कोमल अभिव्यक्तियों में से एक है। 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 
इन दिनों दुबई में
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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