ग़ज़ल
अब भी नज़र जो डालें तो,इल्म ओ हयात है|
गुज़रा बहुत है फिर भी बाकी क़ायनात है|
कैसे कहेंगे क़ायनात में नहीं है कुछ
इल्मोअदब के साथ ये आदम की' जात है|
जिनको मिलीं मुहब्बतें वो हैं सुकून में
बाकी बचे की ज़ीस्त में क्या काली रात है|
ऐसा है कौन लूट ले आदम का चैन जो
वो कौन शूरमा है ये किसकी बिसात है|
ज़न्नत की बात जो करें ज़न्नत मिले मगर
कुछ के ख़याल में तो इक दोज़ख की बात है|
प्रदीप ध्रुव भोपाली,
भोपाल,म.प्र.
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काव्य
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