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कहानी : सुमन - मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल


 कहानी : 

सुमन

        सुमन जल्दी जल्दी तैयार होकर ऑफिस के लिए निकली ।वह बस का इंतजार कर रही थी । सड़क के उस पार के बस स्टैंड पर एक बहुत बुजुर्ग व्यक्ति के साथ एक लड़की उन्हें कुछ समझा रही थी । उसने पास की दुकान से पानी की बोतल और कुछ खाने का सामान उन्हें  पकड़ाया । कुछ देर उनके साथ बैठी फिर निकल गई ।न जाने क्यों सुमन की नजर उस बूढ़े व्यक्ति पर से हट ही नहीं रही थी ।उसके मन में कुछ आशंका उठ रही थी । इतने में उसकी बस आ गयी और वह ऑफिस चली गयी ।

     ऑफिस में भी उसे उनका ध्यान आता रहा । शाम को क़रीब साढ़े सात बजे वह उसी बस स्टैंड पर उतरी , देखा वे वहीं बैंच पर अपने झोले का तकिया बना कर सो रहे थे । वह चुपचाप अपने घर आ गई ।

जैसे ही उसने दरवाजा खोला पिंकी कूद कर चढ़ गई और म्याऊँ म्याऊँ करने लगी ।सुमन ने उसे गले से लगा लिया । थोड़ी देर उसके साथ खेलने के बाद अपने लिये खाना बना कर पिंकी को भी खिलाया और सो गई।

  सुमन अनाथालय में पली थी उसके आगे पीछे कोई नहीं था । अनाथालय बहुत अच्छा था वहाँ की संचालिका सब लड़कियों का अपनी बेटी जैसे ही ध्यान रखतीं। वे सभी लडकियों की पढ़ाई पर बहुत ध्यान देतीं। उस अनाथालय में हर उम्र की पैंतालीस लड़कियां रहती थीं । जिनकी पढ़ाई पर अनाथालय का हर व्यक्ति ध्यान रखता । सुमन ने भी बैंक की परीक्षा पास कर ली थी तथा एक बैंक में नौकरी करने लगी। वहाँ के नियमानुसार उसे अनाथालय छोड़ना पड़ा और वह एक किराए के घर में रहने लगी थी। उसकी प्यारी दोस्त बस वह बिल्ली ही थी या फिर अनाथालय।

      एक अकेलापन हमेशा उस पर तारी रहता । उस बूढ़े व्यक्ति को देखकर न जाने क्यों उसके भी अकेले होने का एहसास हो रहा था उसे लगा जैसे वे भी उसी की तरह बहुत अकेले हैं। अगले दिन वह उठी और सब काम निपटा कर ऑफिस के लिए निकली । अचानक उसकी नजर सामने वाले स्टैंड पर पड़ी क्या देखती है कि वे बूढ़े व्यक्ति वहीं बैठे हैं। उसे बहुत उत्सुकता हुई कि वो लड़की क्या आई नहीं? इतने में बस आ गई। वह ऑफिस के लिए निकल गई ।

      आज उसका मन ऑफिस में नहीं लगा ।उसने लंच भी नहीं खाया ।वह ऑफिस से निकलने लगी तो कैंटीन से सब्ज़ी रोटी बँधवा ली। वो जब बस से उतरी तो उन्हें वहीं बैठा पाया। उससे रहा नहीं गया। वह उनके पास गई और पूछा 

  “बाबा आप दो दिन से यहाँ बैठे हैं, कोई आपको लेने नहीं आया?”  वे निरीह आँखों से उसे देखने लगे पर कुछ बोले नहीं ।

 “बाबा बताइए न ! आप यहाँ कैसे बैठे हैं ? आप का घर कहाँ है ? चलिए मैं आपको पहुँचा देती हूँ।”

 वे कुछ नहीं बोले पर उनकी नज़र उसके टिफ़िन पर अटक गई थी। सुमन समझ गई कि शायद वे भूखे हैं।उसने झट से अपना टिफ़िन उन्हें पकड़ा दिया। पहले तो वे थोड़ा झिझके फिर टिफ़िन लेकर खाने लगे।उनकी आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। सुमन चुपचाप उन्हें देखती रही। जब वे खा चुके तो सुमन ने फिर एक बार पूछा।

“बाबा बताइए न… आप दो दिन से यहाँ क्यों बैठे हैं ?”

“बेटा ! तुम मुझे किसी वृद्धाश्रम में पहुँचा दो। मुझे लेने कोई नहीं आएगा।”

 “क्यों बाबा ! आपके बेटे बहू , बेटी दामाद कोई तो होगा ?”

 “नहीं बेटा ! मेरा तो एक ही बेटा था , दो साल पहले नहीं रहा।”

 “तो क्या वो लड़की !जो आप को बिठा कर गई थी ,वह आप की बहू थी ?”

 “हाँ, बेटा वह मेरी बहू थी, बेटे के जाने के बाद हम दोनों पति पत्नी ने उसका अपनी बेटी जैसा ही ध्यान रखा। उसके माता-पिता तो थे नहीं और भाई भाभी ने अपने पास रखने से मना कर दिया। हमारा भी कोई सहारा नहीं था तो हम एक-दूसरे के सहारा बन गये पर वह दिन पर दिन बहुत चिड़चिड़ी होती जा रही थी। कुछ महीने पहले हमारे बेटे का जन्मदिन था। मेरी पत्नी चाहती थी कि हम अनाथालय में बच्चों के साथ समय बिताएँ।हम ने रश्मि, हमारी बहू से कहा चलो आज विक्रम का जन्मदिन अनाथालय में मनायेंगे, पर वह चिढ़ गई कहने लगी ‘आप का बेटा तो मर गया है पर मैं ज़िंदा हूँ आप को मेरा जन्मदिन तो याद नहीं रहा।आप ही चले जायें।’ कहकर वह रोने लगी ।

“मेरी पत्नी उसे मनाने लगी पर वह जार-जार रोती रही।हम तीनों ही उस पूरे दिन रोते रहे।”

“मेरी पत्नी को बहुत सदमा लगा।अगले दिन वह नहीं उठी। नींद में ही वह सब दुखों से पार हो गई।”

 उसके क्रिया कर्म के बाद मैंने रश्मि को अपने मकान के पेपर दिए और कहा बेटी अब इस इतने बड़े बंगले की हमें ज़रूरत नहीं है तुम किसी ब्रोकर से बात करो और एक छोटा घर  ले लो ।बाक़ी बचे रुपयों की FD करवा लो जिससे मेरे जाने के बाद तुम्हें किसी भी तरह की परेशानी नहीं होगी।

पहले तो वह कुछ सकुचाई ,फिर मेरे समझाने पर तैयार हो गई ।उसके बाद उसने मुझसे बहुत सारे पेपर्स पर दस्तख़त करवाए। मैंने भी उस पर विश्वास कर सब पेपर्स पर दस्तख़त कर दिए।

पिछले हफ्ते कहने लगी , बाबू जी मकान बिक गया है। हमें जल्दी ही ये घर खाली करना होगा।

 तो फिर हम कहाँ जाएंगे ? मैंने पूछा 

 उसकी चिंता आप मत कीजिए,  मैंने एक घर ले लिया है।हम दो तीन दिनों में ही अपने नये घर में चलेंगे।

“अरे कहाँ मकान लिया है ? किसे बेचा है कितने में बिका ? तुमने कुछ बताया ही नहीं।”

“अरे बाबूजी ! मैं बहुत पढी लिखी हूँ और वकील हूँ , मुझे कोई बेवक़ूफ़ नहीं बना सकता।बाबूजी अब आप बैंक चल कर अम्मा जी के लॉकर में मेरा नाम भी चढ़वा दीजिए । 

मैं भौंचक्का हो कर उसका मुँह देखता रहा।अगले दिन उसने बैंक में भी सब जगह अपना नाम जुड़वा लिया।

कल मुझे यहाँ बिठा कर बोली बाबू जी आप यहाँ बैठें मैं कुछ देर में आकर आपको ले जाऊँगी हम अपने नये घर में चलेंगे। कहकर वे फूट फूटकर रोने लगे ।

  सुमन हतप्रभ रह गई । एसा भी कोई कर सकता है क्या ? जिसने अपना सब कुछ सहर्ष उसके नाम कर दिया ,उसके साथ इतना बड़ा धोखा कोई कैसे कर सकता है कि सड़क पर ही बिठा दिया।

     सुमन ने उनसे कहा बाबा अब तो रात हो गई है। अभी आप मेरे साथ मेरे घर चलें । मैं कल ही आपको वृद्धाश्रम पहुँचा दूँगी।

    नहीं बेटा मैं यहीं ठीक हूँ तुम कल आ जाना और मुझे वृद्धाश्रम पहुँचा देना।

वे किसी तरह उसके साथ जाने को तैयार नहीं हुए ।सुमन भी अन्यमनस्क सी घर लौट आई ।

     अगले दिन वह सुबह ही बस स्टैंड पर पहुँची बाबा वहीं बैठे थे ।वह उनके लिए चाय बिस्किट ले कर आई थी । 

    चाय पीने के बाद वे बोले चलो बिटिया एक एहसान और कर दो कि वृद्धाश्रम पहुँचा दो ।

      बाबा मैं चाहती हूँ कि आप मेरे बाबा बन कर मेरे साथ रहें , मैं भी अकेली हूँ कह कर उसने उन्हें अपने बारे में सब बताया ।बाबा की आँखों में आँसू भर आए ।

    नहीं बेटा मुझे तो तुम वृद्धाश्रम ही पहुँचा दो ।

    बाबा मुझे भी बाबा मिल जाएंगे और आप को बेटी ।

    बहुत ज़ोर देने पर वे राज़ी हो गए और सुमन के साथ उसके घर की तरफ़ चल पड़े।

 - मधूलिका श्रीवास्तव 

E-101/17 शिवाजी नगर 

भोपाल म.प्र. (462016)

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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