काव्य :
कविता और जीवन
आज वह कवि सम्मेलन में आई थी,
पर उसका चेहरा
किसी पंक्ति से ज़्यादा
चोटों की कहानी कह रहा था।
कहती रही—
रोटी बनाते हुए जल गया,
और फिर सुनाई
महिला सशक्तिकरण पर कविता।
तालियाँ बजीं,
पर शब्दों के बीच
उसकी खामोशी कराहती रही—
वह अभी सशक्त नहीं,
अब भी आशक्त थी।
मैं सोचता रहा,
कविता और जीवन का
मिलन
आख़िर कब होगा?
- डॉ अंजना गर्ग ( सेवानिवृत)
म द वि रोहतक
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