वह ग़रीब थे ग़रीब ही रह जाते हैं
अन्न की अहमियत वही जानते हैं
जिसे मुश्किल से खाना मिलता है,
वो क्या जाने अन्न की अहमियत,
जो थोड़ा खाकर बाक़ी फेंकता है।
घर से टिफ़िन भर कर ले जाते हैं,
आधा खाकर आधा फेंक देते हैं,
भूखा ग़रीब वह उठा कर खाता है,
उन्हें पेटभर खाना नहीं मिलता है।
किसान मज़दूर मेहनत करते हैं,
खेतों में अनाज वही उपजाते हैं,
मेहनत की लागत भी नहीं मिलती,
वह ग़रीब थे ग़रीब ही रह जाते हैं।
बड़े बड़े संस्थानों और दफ़्तरों में,
कर्मचारी दोपहर में खाना खाते हैं,
जो बच जाता है, उसी भोजन को,
हमें खिला देना चाहिये ग़रीब को।
होटलों में और शादी समारोहों में,
बचा हुआ भोजन बाँट दें ग़रीबों में,
कहते हैं “उतना ही लें थाली में,
भोजन व्यर्थ न जाये नाली में”।
अन्न की बर्बादी नहीं, बचत होगी,
ग़रीब का पेट भरेगा, दुवा मिलेंगी,
आदित्य सब सुखी व स्वस्थ होंगे,
देश समाज की सुखसमृद्धि बढ़ेगी।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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