कभी कभी दिल में
सुनूं रास्तों की गुहार
रहे जो,मुझे पुकार
देखूं ,ऊंचे, वृक्ष देवदार
या
देखूं ,हरियाली भरे परबत
बादल जो हैं, गगन तक
छाया जो है ,रस्तों पर
या
सब कुछ आत्मसात कर लूं
हरी धरा पर बैठ,बात कर लूं
दिन स्मरणीय,सुहानी रात कर लूं
*ब्रज*, समेट लूं सब,अक्षरों में
इबारत ,ये लिखूं फिर,फिर
कभी कभी,दिल में ये खयाल आता है
डॉ ब्रजभूषण मिश्र,भोपाल
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काव्य
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