तुम में ही
तेरे नयनों में ही
अपनी शक्ल देखूँ
नहीं जरुरत किसी दर्पण की
तेरे फौलादी बांहों के
आलिंगन में महफूज़
महसूस करूँ, नहीं चाहिए कोई और
सुरक्षाकवच
विरान घर के तुम ही
रौनक हो,
नहीं और है कोई दूजा, जो प्रकाश-पुंज बन कर
आ सके, अंधेरा मिटा सके
जीवन के मजबूत स्तम्भ सरीखे हो तुम
लिपटी उस पर
अमरलता सी मैं
कैसे ये न कहूं, तुम ही हो
- मंजु लता , नोयेडा
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काव्य
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