ad

व्यंग्य : मुर्दों के वोट - संतोष श्रीवास्तव,भोपाल


 

व्यंग्य : मुर्दों के वोट

राजा ने बेताल के शव को कंधे पर डाला और चल पड़ा।

"सुनो राजन्!..." शव में स्थित  बेताल बोला- इस बार तुम्हारी थकान उतारने के लिए मैं एक गधे की कथा सुनाता हूं। बोझा ढोने वाले गधे की।"

" नहीं बेताल, आज मैं कहूंगा और आप सुनेंगे। लेकिन केवल सुनना ही नहीं है, जवाब भी देना है ।"

"नि:संकोच कथा कहो राजन, मैं जवाब देने को प्रस्तुत हूँ।"

"राजपद का अपना रुतबा बचाए रखने के लिए हम लोकसभा चुनाव में खड़े हो रहे हैं। जीतने के लिए आपकी सहायता की आवश्यकता है। आप सहायता करेंगे तो मैं अवश्य चुनाव जीत जाऊंगा।"

बेताल चकराया-"मेरी सहायता? मैं तो शव हूँ! शव तुम्हारी क्या सहायता करेगा।"

"आपको पता है, चुनाव में दिवंगतों की बहुत आवश्यकता होती है।

"दिवंगतों की!" ठहाका लगाया बेताल ने।

आप नहीं जानते वोटिंग लिस्ट में दो तरह के मुर्दों का नाम दर्ज रहता है; एक उनका जो मर चुके हैं और दूसरा उनका जो पोलिंग के दिन मरते हैं।"

"पोलिंग के दिन?"बेताल फिर चकराया।

"जी हां.... वे प्रत्याशियों द्वारा दी रिश्वत की लालच में अपना ईमान, धर्म यहां तक कि सोचने की शक्ति तक गंवा बैठते हैं ।और जिसमें यह तीनों गुण नहीं होते वह तो मुर्दा ही है ना।"

 "सही कह रहे हो राजन।"

" वही तो, आप तो मुझे सारे मुर्दों के वोट दिला दीजिए।" राजा ने प्रार्थना की 

"इतने भर से जीत जाओगे?" "बाकी मैं खरीद लूंगा न। बिजली ,पानी, स्कूल ,अस्पताल की सुविधा देने और बेरोजगारी खत्म करने के वादे करके।"

" मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा तुम राजा होकर भी चुनाव लड़ना और जीतना क्यों चाहते हो?" बेताल ने पूछा।

"आप समझ ही नहीं रहे हैं ।राजा का कोष राजा का कहां होता है? वह अगर दुश्मन से हार गया तो उसे अपने राज्य और कोष दोनों से हाथ धोना पड़ता है।लेकिन अगर चुनाव में

" जीत गए तो... रुतबा बरकरार। घोटाले करके,जनता को बेवकूफ बनाकर इतना कोश भर जाता है कि पीढ़ियों के वारे-न्यारे।"

"और बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल...?"

राजा हँसा--"आप भी... प्रजातांत्रिक चयन का यही तो फायदा है। राज भी, धन भी, यश भी। जवाबदेही कुछ नहीं।"

"यह तो धोखा है सरासर! मैं इस धोखे में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता। मैं चला।" बेताल क्रोधित हो बोला और हड़बड़ी में घने जंगल में न जाकर सड़क किनारे के बरगद के पेड़ पर जा लटका।

राजा ने अपने उस कंधे को झटका जिस पर बेताल लटका था-

"चुनाव तो मैं जीत ही लूँगा बेताल।"

बरगद के पेड़ की ओर देख राजा मन ही मन  मुस्कुराया--सुनो बेताल , चुनाव जीतकर सड़क पक्की करने के बहाने सबसे पहले बरगद के इस पेड़ का ही काम तमाम करवाऊँगा। जिस पर तुम मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए लटके हो।

****

संतोष श्रीवास्तव,भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post