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शाम सावन की गीत कविता संग मनभावन की : अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की राष्ट्रीय तथा मध्यप्रदेश इकाई के संयुक्त तत्वावधान में काव्य गोष्ठी सम्पन्न


 

शाम सावन की गीत कविता संग मनभावन की : अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की राष्ट्रीय तथा मध्यप्रदेश इकाई के संयुक्त तत्वावधान में काव्य गोष्ठी सम्पन्न

भोपाल । सोमवार, 8 जुलाई 2024 को अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की राष्ट्रीय तथा मध्यप्रदेश इकाई के संयुक्त तत्वावधान में  काव्य गोष्ठी "शाम सावन की गीत कविता संग मनभावन की" संपन्न हुई, जिसमें कवियों ने प्रकृति से हो रही रिमझिम फुहारों के बीच अपने काव्य - रस की फुहारों से सभी को सराबोर किया। कविता गूगल मीट पर संपन्न हुई। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार - संपादक डॉक्टर संजीव कुमार ने की। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि आज पढ़ी गई हर कविता में प्राकृतिक बिंबों का समावेश था। साथ ही उनका कहना था कि लोकगीतों पर आधारित रचनाएँ हमेशा मन को लुभाती हैं। 

मंच की संस्थापक- अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार संतोष श्रीवास्तव ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सावन गीतों में दादुर - मोर - पपीहे आदि की लीक पर चलती बातों से हटकर कुछ नव बिंबों को लेकर सृजन किया जाना चाहिए। 

कार्यक्रम में जया केतकी शर्मा ने सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदना की और उनके साथ आभासी मंच की ओर से महिमा श्रीवास्तव वर्मा ने दीप प्रज्वलित किया। 

कार्यक्रम का संचालन महिमा श्रीवास्तव वर्मा ने किया। 

इस अवसर पर संतोष श्रीवास्तव  ने -

अब के सावन में यूं टूट कर बरसा पानी / अब के मुलाकात अधूरी सी लगी/ अब के पंछी भी शाखों पे अनोखे से दिखे /कजरी मल्हार भी ढोलक पे अचीन्ही  सी लगी

डॉ. शबनम सुल्ताना ने -

रिमझिम रिमझिम बूंदों में बस जाता है 

दुर्गरानी श्रीवास्तव ने -

अम्बवा डाली झूला डाल, राधा झूल रही बागों में,

महिमा श्रीवास्तव वर्मा ने -

मेघ -पोटली खुल गई,बरसी मोती- धार 

आंचल भर लेती धरा,उनको बाँह पसार 

नविता जाैहरी ने - 

झूम के बारिशें आ गयीं /ये छटाएँ हमें भा गयीं।

उषा सक्सेना ने -

सात सुरों की सरगम लेकर तान छेड़ती रिमझिम रिम  

शेफालिका श्रीवास्तव ने  -

हरे रामा आज अँगन मे फुहारें गिरें रे देखो ,न्यारी रे हाँ री ..

अनीता रश्मि ने -

धरा के अंचल से देखो गाछों का सिमटा जंगल है 

सावन-भादो रूठा, बादल रूठे,कजरी रूठी, नदियाँ रूठी

रमा त्यागी ने -

इन ज़ख्मों को ना कुरेदो नज़र आयेंगे ये ,

सावन का महीना है हरे हो जाएँगे ये 

डॉ. मंजुला पांडेय ने -

बावली सी इक पवन  एक शाम कह गई/आ रही हूं झूम के मेघ साथ में लिए 

साधना तोमर ने -

रिमझिम रिमझिम पड़े फुहारें, झूम रही बरखा रानी है। 

कमल चंद्रा ने -

हरित प्रिया वसुधा ने ओढ़ी हरी चुनरिया /सज धज के श्रंगार कर

चली पिया मिलन बावरिया

नीलिमा रंजन ने- 

'सावन घन तुम्हरे संग साथ /स्मृति के वारिद घिर आए '

विद्या सिंह ने -

गाए बदरिया मल्हार सखी री सावन आयो। डाल डाल पर झूले पड़े हैं 

 कजरी की छाई बहार सखी री

रानी सुमिता ने -

मेरे शहर की बारिश,थोड़ा ठहरो

अपनी कविताएँ पढ़ीं। 

गोष्ठी बेहद मनभावन और सफल रही।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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