काव्य :
कवि मन
अन्तर्द्वन्द के उर ज्वाला से
यह कवि मन जब जलता है
लिपट -लिपट कर तपता है
तब जाकर तम छंटता है ।।
स्वागत करता उस जीवन का
जिसमें केवल विष पान किया
करुणा,दया और ममता लेकर
विभिन्न रसों का गुणगान किया
शब्दों में वो भावना गुनता है ।
सच कहता है भरमाता है
सूनी रात या महफ़िल चुनता है
खेत-खलिहान महलों में घूमा
पत्तों और फूलों संग महकता है
खुशी में नदियों संग बहता है ।
बिखर गए हर स्वप्न नयन के
छोड़ चलें सब रिश्ते चयन के
जीवन -मरण के प्रश्नों को
जब कोटि हृदय चटकाता है
तब कवि हृदय से उत्तर रखता है।।
- सुनीता जौहरी वाराणसी
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