काव्य :
सुनो सखी
सुनो सखी,
सुना है बहुत अच्छा लिखती हो l
क्या लिख सकती हो, मेरा दर्द?
सब प्रेम पर लिखते हैं,
श्रृंगार पर लिखते हैं,
कोई प्रीतम पर, कोई प्रीति पर,
कोई मनचाहे मनप्रीत पर लिखता है l
तुम तो मेरी सखी हो,
मेरा दर्द भी तो जानती हो l
तो लिखो न मेरा दर्द,
मेरे आंसुओं की स्याही से l
इन चाय की चुसकियों में,
डूबाती हूँ अपना दर्द l
इन आँखों में छुपाती हूँ अपने अश्क़ l
इन तन्हाइयों को समेट लेती हूँ,
रात की वीरानियों की चादर में l
खुद से खुद की बात करती,
खुद से अपने अश्रु छुपाती,
जीती नहीं, ढोती हूँ जिंदगी को l
सुनो न, कुछ तो लिखो,
मैं कहूं, तुम सुनो,
और फिर लिख दो अपनी डायरी में,
मेरे आंसुओं को, मेरे दर्द को l
मेरी तन्हाइयों को और रुसवाइयों को,
और हाँ,
मुझे भी लिख सको तो,
जरूर लिखना l
- बिन्दु त्रिपाठी ,भोपाल
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