हे डॉक्टर तुम पर हमें नाज है
सेवा में हो ,लीन तुम इतने
बीमार का, जीवन सँवारते
करते खुद की परवाह नहीं
अपना जीवन भी हो वारते
तुमसे,रोगी का कल और आज है
हे डॉक्टर ,तुम पर हमें नाज है
भूख,नींद, भी हारी तुमसे है
तुम बीमारी से न हो हारते
परिवार की पीड़ा,भूल भूल
पीड़ित का दर्द, हो उबारते
तुमसे,रोगी का कल और आज है
हे डॉक्टर ,तुम पर, हमें नाज है
मल, मवाद,मैला,कचरा
तुम में ,न घृणा घर ,कर पाते
रोगी की नियमित, धड़कन सुन
तुम ,हँसते और हो ,मुस्काते
तुमसे ,रोगी का कल और आज है
हे डॉक्टर ,तुम पर हमें नाज है
करता जीवन, सेवा में,तूँ, अर्पित
निज- हिंसा, में भी है, तूँ समर्पित
तेरे पास न है,स्वयं के लिए वक्त
तुझमें ना जाने है ,कौन सा रक्त
तुमसे, रोगी का,कल और आज है
हे डॉक्टर ,तुम पर,हमें नाज है
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
Tags:
काव्य
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