हाल ए हकीकत
देखकर दुनिया का ये नजारा
सुंदर लगता है जहां ये सारा
पास आने पर पता चलता है
हर इंसान है कितना लाचारा।।
कुछ अच्छे इंसा है इस जहां में
जिनके दम पर टिका ये जग सारा
झूठ का मजमा कायम है यहां पर
और लालच का है यहां भंडारा ।।
मर चुकी इंसानियत इस जग में
हर इंसान है भ्रष्टाचार का मारा
धर्म दब चुका अधर्म के बोझ से
हैवानियत का है अब बोलबाला ।।
प्यार मोहब्बत की तो बात छोड़ो
हर इंसान है आज धोखे का मारा
इंसा का दुश्मन इंसा बन बैठा
खो गया है कभी का भाई चारा ।।
सीधों की नही टेढ़ों की दुनियां है
कानून बन गया है कितना लाचारा
ये हाल ए हकीकत है दुनिया की
कलियुग का है का मारा ये जग सारा।।
- पंडित अभय चौरे हरदा मप्र
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काव्य
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