ad

काव्य : जब छाई काली घटा - रमाकांत सोनी सुदर्शन नवलगढ़


 जब छाई काली घटा

विधा गीत


जब छाई काली घटा, उमड़ घुमड़ मेंघा आए।

रिमझिम बदरिया बरसे, उपवन सारे हरसाए।

जब छाई काली घटा 


घन गाए बिजली चमके, नेह बरसे हृदय अपार।

मूसलाधार बूंदे पड़ रही, सावन की मधुर फुहार।

ठंडी ठंडी मस्त बहारें, भावन अंबर में छाई घटा।

दमक रही दामिनी गड़ गड़, व्योम में बादल फटा। 

जब छाई काली घटा 


झूमें मोर पपीहे वन में, उपवन महके पुष्प घने। 

ताल तलैया भर गए सारे, खेत सजीले बने ठने। 

सरिताएं कल कल गीत गाती, दादूर ने राग रटा। 

महक उठी वादियां सुंदर, कुदरत की भव्य छटा। 

जब छाई काली घटा 


वृक्ष लताएं वन उपवन, जब धरती ने ओढ़ी चूनर।

हरियाली छाई धरा पर, सब तरुवर झूमें होकर तर। 

काले काले बादल मानो, नभ में  बिखरी केश लटा। 

बरसात की बूंदे भाती, खोली हो शिव ने शीश जटा।

जब छाई काली घटा 


- रमाकांत सोनी सुदर्शन 

नवलगढ़ जिला झुंझुनूं राजस्थान 


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post