काव्य :
सावन
छम- छम पायल बज रही,नाचे मन का मोर।
गोरे -गोरे पाँव में, झुन झुन करते शोर।
मेरी पायल कह रही,सुन सजना की बात।
पिय मेरे परदेस में,कैसे बीते रात।
बरसे सावन की झड़ी,लगती जैसे तीर।
साजन मेरे दूर हैं ,किसे सुनाऊँ पीर।
सावन आया झूम कर,सिमट गया सब काज।
छप्पर लोर बहा रहा,भूखे हैं सब आज।
टर -टर बोले बोल है,दादुर छुप के देख।
बरखा की बूँदें पड़ी,कवि गण लिखते लेख।
झींगुर,दादुर कर रहे,मेघ देख कर शोर।
कारे बदरा छा गए,नीर बहाते कोर।
राह निहारूँ साजना ,कहे मेघ से मीत।
मत बरसों तुम आज रे,लगी लगन की प्रीत।
बिन्दी,सजती माँग पर,साजन मेरा भाल।
प्रीत प्रेम में डूब कर,मैं तो हुई निहाल।
- सविता गुप्ता , राँची /झारखंड
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