काव्य
मन ही मन में युद्ध छिड़ा है
कहीं काट डाले हैं जंगल, कहीं धरा का दोहन करते।
छीन लिया है जिनका बसेरा, वो सब आज रुदन हैं करते।
बहु मंजिला इमारतें हैं, सब में ए.सी लगे हुए हैं।
किंतु पास में पेड़ नहीं हैं, डब्बे से घर बने हुए हैं।
ए.सी से जो ताप निकलता, गर्मी उफन उफन बहती है।
चलना भी बदहाल हुआ है, जनता मजबूरन सहती है।
दफ्तर जाना बहुत जरूरी, घर से बाहर कैसे निकलें।
रहम जरा सा कर दे भगवन, थोड़ी सी लू को कम कर दे।
तेरा कोई दोष नहीं है , मानव का ही दोष है सारा।
उसने पर्यावरण बिगाड़ा, लोगों का सुख चैन उजाड़ा।
कंक्रीटों के नगर बसाए, धरती अब जल सोख न पाती।
बूँद- बूँद जल को तरसे जो, व्यथा किसी को नजर न आती।
कहीं बाढ़ आती है भारी, सब कुछ साथ बहा ले जाती।
बाढ़ नियंत्रण विभाग की, पर नींद कभी भी खुल नहीं पाती।
कई बाढ़ में मर जाते हैं,कहीं लोग सूखे से मरते।
जिम्मेदारी जिन लोगों की, आँख मूँदकर बैठे रहते ।
एयर कंडीशन कमरों में योजनाएं बनती रहती हैं।
काम नहीं होता है कुछ भी, सिर्फ कागजों में बनती हैं।
कैसे मैं समझाऊँ इनको, *मन ही मन में युद्ध छिड़ा है।*
कोई जुगत नहीं दिखती है, आपस में हर कोई भिड़ा है।
न जाने क्यों एक दूसरे से, हर कोई चिढ़ा-चिढ़ा है।
मैं क्यों मानूँ बात किसी की,इस जिद पर हर कोई अड़ा है।
-राधा गोयल,विकासपुरी,दिल्ली
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