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काव्य : गुरु पूर्णिमा - पद्मा मिश्रा,जमशेदपुर


 काव्य : 

गुरु पूर्णिमा  

(1)

अंधकार से जो प्रकाश का स्वप्न दिखाते हैं,

जीवन की शूलभरी राहों पर पुष्प खिलाते हैं।

संघर्षों में जो मंगल के गान रचाते हैं,

वंदनीय जग में गुरु की अनुपम सौगातें हैं।  

अमर हुए तुलसी, कबीर भी गुरु का ज्ञान मिला,

प्रतिभा की जय हुई जगत में शुभ सन्मार्ग मिला।

एकलव्य, आरुणि गर्व के गान सुनाते हैं

वंदनीय जग में गुरु की अनुपम सौगातें हैं।

प्रथम गुरु है माँ, जीवन का पथ दिखलाती है

अपने अंचल की छाया में सुख सेज बिछाती है।

जग में हुए ख्यात ममता के लाल कहाते हैं

वंदनीय जग में गुरु की अनुपम सौगातें हैं।

(2)

डगमग होते है पाँव अगर तुम हाथ थाम बढ़ जाते हो।

जीवन की लंबी राहों पर एक राह नयी दिखलाते हो।

तुम गुरु, ज्ञान का गौरव हो, निज धर्म, बुद्धि की परिभाषा

अज्ञान तिमिर जब बढ़ जाए, अनुभव के दीप जलाते हो।

अंतर की कोमल माटी पर करुणा की मँजरिया खिलती,

तुम हृदय बुद्धि का मान लिए, साक्षर विवेक बन जाते हो।

गुरु के चरणों में अर्पित है, शत बार नमन, पावन वंदन

अभिनंदन है शत बार तुम्हें, भावों के दीप करूं अर्पण!!


- पद्मा मिश्रा,जमशेदपुर


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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