काव्य :
ग़ज़ल
मेरी आँखों में है नमी ज़िंदा
एक अहसास इक कमी ज़िंदा
ये शरीफों की ही शराफ़त है
अब तलक हैं जो तिकड़मी ज़िंदा
बच के रहिये बदलते मौसम से
कुछ वबाएँ हैं मौसमी ज़िंदा
तब तलक बादशाह हैं बेबस
जब तलक हुक्म बेगमी ज़िंदा
ग़म समझता ख़ुदा है बंदों का
कैसे रहते हैं आलमी ज़िंदा
रब से इसके सिवा न मांगू कुछ
हो पड़े फिर से आदमी ज़िंदा
मैं निभाऊँ भी किस तरह रिश्ता
जिसमें है अब भी बरहमी ज़िंदा
- रजनी टाटस्कर, भोपाल
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