काव्य :
मित्रता --दो कवितायेँ
मित्रता प्रभात की अरुणिमा सा राग लिए ,
जोडती दो हृदयों को,दूरियां मिटाती है
झंकृत कर वीणाके अनसुलझे तारों को ,
नेह की अनोखी वो रागिनी सुनाती है
दुःख भरी उदासी का अँधियारा मिट जाये ,
स्नेह और करुणा का सूरज उगाती है,
अमृत की बूंद लिए बरसती संजीवनी सी ,
मित्रता अमरता की कहानी बन जाती है.
त्याग,स्नेह,ममता ,करूणा समर्पण से ,
भटके हुए कदमों को रास्ता दिखाती है,
पथरीली राहों पर ,जीवन के सुख दुःख में ,
मित्रता हमारी मशाल बन जाती है
जीवन संघर्षों में ,थकेहारे तन- मन में ,
मित्रता ही साहस और जोश भर जाती है,
प्यार भरे हृदयों के बीच सेतुबंध बनी ,
मित्रता मरुस्थल की प्यास बन जाती है
[२]
छूट जाये हाथ मगर साथ नहीं छूटे
छूट जाये हाथ मगर साथ नहीं छूटे
अनजानी राहों पर कांटे ही कांटे हैं
अंधियारे जीवन में बिखरे सन्नाटे हैं ,
मंजिल हो दूर सही सांस नहीं टूटे .
छूट जाये हाथ मगर साथ नहीं छूटे ,
तुम अगर साथ रहो, दूरियां सिमट जाएँ
पलकों पर सोई हुई यादें निकट आयें
आसमां को छूने की आस नहीं टूटे ,
छूट जाये हाथ मगर साथ नहीं छूटे
सतरंगी सपने हैं ,लहरों सा जीवन है ,
खुशियाँ की चाह लिए तरसा अंतरमन है ,
जैसे ,उमड़ती घटाओं में बारिश की बूंदें .
छूट जाये हाथ मगर साथ नहीं छूटे
कविता -मित्रता संजीवनी सी
लो यह सुमन आशीष भी
मै आज तुमको सौंपती हूँ,
नेह का उपहार समझो या ह्रदय की भावनाएं,
कामनाओं का सकल संसार तुमको सौंपती हूँ,
यह नहीं प्रतिदान कोई,
अनछुए अनजान पल का,
कह सकोगे क्या कभी तुम,
यह नहीं अवदान मन का?
अश्रु बूंदों में समर्पित दान तुमको सौंपती हूँ,
मित्रता संजीवनी सी,
मधुरता गंगा सी पावन ,
मलिनता की बूँद भर भी,
कर सकी ना मन अपावन,
भावनाओं में गुंथा सम्मान तुमको सौंपती हूँ,
- पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
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