काव्य :
बचपन की यादें
कैसे किन शब्दों में
बताऊँ?
कैसे बीता मेरा
बचपन,
नटखट,शोख,शरारत
के बदले
था आवारा श्वान-
सा बचपन।
सर पर था खुला आकाश
मगर अपना नहीं था,
था टुकड़ा जमीं का
मगर म्युनिसिपैलिटी का,
हरामी पिल्ला, कमीना
उल्लू का पट्ठा
यही अलंकृत नाम
मेरा था।
भागती-दौड़ती
मोटर गाड़ियों के पीछे
हाथ पसारे,
गालियाँ खाता,
भूखे पेट ढाबों पर
दो सूखी रोटी की खातिर
लातें खाता बीता
बचपन।
माँ की गोद
से वंचित,
लोरियाँ सुनने को
तरसती रातें,
पिता के मजबूत काँधे
और अँगूली
को थामने के लिए
तड़पते हाथ
लिये मासूम बचपन
नहीं बेबस,लाचार
मिला बचपन।
काँधे पर बस्ते का
बोझ नहीं
कचरे का कट्टा ढोते
बीता बचपन
खेल के मैदान नहीं
रेल की पटरियों
पर बोतलें बटोरता
मगर अनपढ़, अलमस्त
नशे में डूबा मिला
बचपन।
- डा.नीलम , अजमेर
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