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चिंतन : एक उम्र : एक अनुभव - सुरेखा अग्रवाल स्वरा , लखनऊ


चिंतन : एक उम्र : एक अनुभव

   अक्सर सच को स्वीकारना आसान नही होता, पर कुछ बातों को नजरअंदाज करके आगे बढ़ना  ही जिंदगी का  फ़लसफ़ा होता है।

  उम्र के इस पड़ाव पर जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है बहुत सी ऐसी बातें, किस्से, हादसे और स्थितियां रही जिसमें संवाद और पूछताछ की आवश्यकता थी,पर रिश्तों   की मजबूती के लिए उन्हें नजरअंदाज करना पड़ा, क्योंकि रिश्तो को समझने के लिए अपनाने के लिए खुद को हर तरह से,तरीक़े से तैयार करना पड़ता है, मनमुटाव मतभेद हर रिश्ते का एक अहम पायदान होता है, उसपर से अगर अपनेपन से कदम बढ़ाकर आगे बढ़ते हैं तो मनभेद  की संभावनाएं ख़त्म हो जाती है(%)

बस हमे तैयार होना पड़ता है, खुद को समझना पड़ता है, समझाना पड़ता है।

बुजुर्गों ने कहा भी है(चार बर्तन एक साथ होते है तो आवाज आनी लाजमी है)

बस आवाज किस तरह  की होनी चाहिए या करनी चाहिए यह पूर्णतया आप पर निर्भर है।

 ख़ासतौर से  तब,जब हम किसी भी नए रिश्तों में बंधते है तब,बातचीत से हम आवाज़ को समझ सकते है  पर आमने सामने हम भावों के माध्यम से एक दूसरे  को समझ सकते है, भाषा शैली, आपकी आवाज़ की सौम्यता या रूखापन आपको व्यक्तिगत मूड़   को बता देता है, तब शायद हम अगले की मनःस्थिति को बारिकी से समझ  सकेंगे।

नही तो फ़िर जो आपकी सोच होगी,उसी सोच के तहत आप अपने विचारों का खाका  खींचते चले जाएंगे,अगर नकारात्मक भाव हो तो भाव उलटे ही  होंगे और समझदारी से सकारात्मक सोचा होगा तो रिश्ते की पॉजिटिविटी  एक समृद्ध परिपाटी के तहत शालीनता और मजबूती से आगे बढ़ेगी, जो एक मजबूत बॉन्डिंग कहलाएगी।

 कोई भी रिश्ता वक्त मांगता है, बारीकी से समझना चाहता है, उस रिश्ते में आपको  स्वीकृति देनी पड़ती है उसकी हर आदत अच्छी हो या बुरी अपनानी पड़ती है, फ़िर ग़र आपने एक बार मन से कदम आगे बढ़ा दिया तो फ़िर दुनियां की कोई भी ताकत उस रिश्ते से आपको अलग नही कर सकती।

क्योंकि यह आपके विश्वास के कदम थे, यह आपके अंदर की स्वीकृति थी।

मेरा विशेषकर मानना है  अपने हर रिश्ते  का सम्मान  आपको तय करना है, हर रिश्ते  की एक सीमारेखा तय होती है।तभी समाज मे कई रिश्ते हैं रिश्तेदारियां भी।

एक दोस्ती के रिश्ते को छोड़कर हर रिश्ते में आपके सामाजिक नियम लागू  है।

और नियमो का  लागू होना  ज़रूरी भी है वरना रिश्तो की परिपाटी अनुशाषित नही रहेगी, मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा दम तोड़ देगी।

हम आधुनिक विचारधारा का अनुसरण भले ही  कर रहे है,पर कही न कहीं हम कुछ समृद्ध परम्पराओं को तोड़ने का काम भी कर रहे है।

 क्योंकि कुछ रिश्ते परम्पराओं के तहत ही अपनी गरिमा को  सशक्त और समृद्ध कर सकते है।

विवाह संस्था के अंतर्गत आने वाले हर रिश्ते अपनी एक सशक्त गरिमा रखते वह किसी भी काल मे हो या युग मे,आधुनिकता की आड़ में हम  भले उन्हें एक स्वछंद माहौल में ढाल दें पर तब भी हर युग मे उसकी अपनी मर्यादित गरिमा हमे रखनी ही पड़ेगी।

क्योंकि उम्र आपके ओहदे को बढ़ाती है, और ओहदे संबोधन का श्री गणेश करते हैं, और जब आप संबोधन के तहत रिश्तो का आंकलन करते हैं तो आप उसिनुसार  सम्मान भी।

उदाहरण.. एक दोस्त को आप किसी भी तरह से अभिव्यक्त कर सकते है क्योंकि दोस्ती किसी उसूलों की मोहताज नही।

माँ एक ऐसा रिश्ता जहां एक सुकूँ  है हर रिश्ते से परे।

पर कहीं अपवाद छोड़कर पिता का रिश्ता मजाक के तौर पर नही लिया जा सकता।आज भले अभिभावक बच्चो के साथ   फ़्री ज़ोन  मे हो पर   आप से तुम पर नही पहुंचे।

जो हमारे  भारतीय परिवेश और संस्कृति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

स्पेस दीजिए और लीजिए भी,पर उतना ही जितना आप उसे निभा सके।

 रिश्तों में #हायरेरकी बुजुर्गों ने सोच समझकर ही बनाई है ताकि अनुशाशन का मान मर्यादित रह सकें ।मुझे याद है आई इनके सामने जल्दी नही आती थी,मेरी  छोटी बहने इनके साथ क़भी मजाक नही करती है,मेरे पिताजी  ने भी कभी दामाद गिरी पे गाज नही गिरने दी।

याद नही की क़भी उन्हीने सुधीर कह के या तुम कहकर संबोधित किया हो।

 याद है एक बार मैंने गुस्सा होकर पापा से ही एक  रिश्ते की शिकायत की थी,

उनका एक  प्रश्न था

"बेटे जब तक मन से किसीको नही अपनाओगी,शिकायतों का दौर जारी रहेगा"

जब लगें कोई गलत है तो पल भर के लिए आंखे बंद कर के अपने मायके के  रिश्तों को सोचना,की जब क़भी ऐसा यहां हुआ तो तुमने उसे कैसे हैंडल किया"

जब हम उम्र भर के  रिश्तों मे बंधते है तब हम  उन्हें मन से स्वीकार करते है,एक बार स्विकार  लोगी तो शिकायत नज़र नही आएगी"

सुनो वसु"जैसा भी उसे अब अपना बना लो"

हम मां बाप है बच्चो के साथ   हमेशा रहेंगे, होंगे तब भी नही रहेंगे तब भी,

एक बात उनकी हमेशा ज़ेहन में"तुम्हे छूने का मन करेगा तब हम आंसू बनकर तुम्हारे  आंखों से बह निकलेंगे,और वही तुम्हारा सुकूँ होगा"

बस  तबसे हर रिश्तो  के संग मन से हूँ, और जहां मन नही वहां से हटने में देर नही करती।

 ज़रूरी नही रक्तसम्बन्ध ही रिश्ते होते है समाज को नई दिशा देने के लिए ही हम विवाह संस्था से जुड़ते है जो एक उत्कृष्ट मिसाल है रिश्तो की,निभाते रहिए ससम्मान।

और बढ़ाते रहिये ओहदेअपने अपने क्योंकि एक उम्र में आकर आपको खुद एक गरिमा में बंधना है क्योंकि तब आप पर बुजुर्ग होने का  विशेषण लगना जो आपके व्यक्तित्व  को विशेष बनाकर विशेष श्रेणी में रखेगा,

 तो हो जाइए तैयार क्योंकि  विशेष ओहदे की एक लंबी कतार आपके साथ जुड़ने वाली है।

 - सुरेखा अग्रवाल स्वरा , लखनऊ

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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