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नर्मदा जयंती पर विशेष..... मां नर्मदा के कंकर भी शंकर : बिना प्राण प्रतिष्ठा के पूजे जाते हैं - शिक्षाविद - रमेशचंद्र चंद्रे , मंदसौर


 ♦️नर्मदा जयंती पर विशेष.....

मां नर्मदा के कंकर भी शंकर : बिना प्राण प्रतिष्ठा के पूजे जाते हैं 

 - शिक्षाविद - रमेशचंद्र चंद्रे , मंदसौर 

    प्रस्तुति - डॉ घनश्याम बटवाल

      पौराणिक मान्यताओं में माँ नर्मदा को विशिष्ट स्थान प्राप्त है ओर लोकपरंपरा में इसके महत्व को सदियों से देखा जा रहा है ।

आस्था और श्रद्धा का पर्याय मां नर्मदा के प्रति विश्वास इतना दृढ़ है कि कोई वर्ग और कोई धर्म के लोग अछूते नहीं हैं ।

मध्यप्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी गुजरात राज्य की जीवनदायिनी भी है । 

 पुराण कथानक के अनुसार  मैकल पर्वत पर भोलेनाथ तपस्या में लीन थे तभी उनकी पसीने की बूंदें "मैंखल पर्वत" पर गिरी, इस दिन माघ माह की सप्तमी का दिन था। उस बूंद से एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ।वह कन्या भी महादेवजी के सामने तपस्या करने बैठ गई, जब भगवान शंकर की तपस्या पूरी हुई और उनकी आँख खुली तो वे कन्या को देखकर बहुत खुश हुवे और उसका नामकरण "नर्मदा" के रुप में कर दिया और वरदान दिया कि, संसार में चाहे प्रलय भी आ जाये तुम्हारा नाश कभी भी नहीं होगा और *संसार में  पापनाशिनी नदी के नाम से तुम्हारा नाम लिया जायेगा।

तुम्हारे किनारों पर जो पत्थर रहेंगे वे "नर्मदेश्वर शिवलिंग" कहलायेंगे और बिना प्राण प्रतिष्ठा के पूजे जा सकेंगे,और तुम्हारे तटों पर शिव-पार्वती सहित सारे देवता निवास करेंगे। सारे संसार में एकमात्र तुम ऐसी नदी होगी जिसकी परिक्रमा लोग करेंगे।

       मैखल पर्वत पर नर्मदा का प्राकट्य हुआ इसलिए ये मैखल सुता कहलाई।

      पुराणों में कथा आती है कि, जब नर्मदा युवा हुई तो, राजा मैकल को अपनी बेटी के विवाह की चिन्ता हुई। राजा ने अपनी रूपवान अति सुंदर बेटी के लिये वर खोजना शुरू किया और घोषणा कर दी कि, "जो भी राजकुमार, मेरी बेटी को गुलबकावली (फूलों की एक दुर्लभ प्रजाति) के फूल लाकर देगा,उसी से मेरी बेटी की शादी होंगी।यह बहुत ही कठिन शर्त थी। अनेक राजाओं ने शर्त पूरी करने की कोशिश की लेकिन पूरी नहीं कर पाए।ऐसे में राजकुमार सोनभद्र ने वीरता पूर्वक यह शर्त पूरी कर दी।                                 सोनभद्र की वीरता से राजा मैंखल बहुत खुश हुए और उससे अपनी बेटी की शादी करने के लिये तैयार हो गये किंतु देवी नर्मदा ने अभी तक सोनभद्र को देखा भी नहीं था, लेकिन उनकी वीरता के चर्चे बहुत सुन रखे थे। माँ नर्मदा के मन में सोनभद्र से मिलने की प्रबल इच्छा हुई, ऐसे में उन्होंने अपनी दासी जुहिला को बुलाकर कहा,मैं राजकुमार सोनभद्र से मिलना चाहती हूँ, और मेरी तरफ से तुम ये सन्देशा लेकर जाओ।

       दासी जुहिला ने कहा कि मेरे पास अच्छे वस्त्र और आभूषण नहीं है तो आप मुझे अच्छे वस्त्र और आभूषण दे दीजिए जिंन्हे पहनकर  मैं राजकुमार के पास सन्देशा ले के जा सकूँ।नर्मदा ने दासी की विनती सुनकर अपने वस्त्राभूषण दे दिये जिससे कि, वह उनका सन्देशा ले जा सके।जुहिला जब माँ नर्मदा का सन्देशा लेकर राजकुमार सोनभद्र के पास पहुँची तो राजकुमार का रूप और उसके गुणों को देखकर मोहित हो गई और वह अपना दिल हार बैठी।उसने अपना परिचय नर्मदा के रूप में दिया।राजसी वेशभूषा और ठाट बाट में आई दासी को राजकुमार सोनभद्र भी उसे नर्मदा समझने की भारी भूल कर बैठे,और उन्होंने भी अपना प्रेम का प्रस्ताव जुहिला के ऊपर प्रकट कर दिया। जुहिला ने भी प्रेम के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया। जब राजमहल से जुहिला को गये हुये काफी समय हो गया था, तब माँ नर्मदा के सब्र का बांध टूटने लगा और तब उन्होंने खुद ही जाकर देखने का मन बनाया और नर्मदा खुद ही वहाँ पहुँच गई जिस जगह उन्होंने दासी को भेजा था। जब वे वहाँ पर पहुंची तब इन्होंने दोनों को जिस प्रकार प्रणय निवेदन करते देखा तो उनका मन कांप उठा,  शोक संतप्त हो उठा।माता को बहुत अपमान महसूस हुआ और वे अपमान की आग में जल उठी और उन्होंने फिर कभी वहाँ न आने का निश्चय कर लिया और वे वहाँ से उल्टी दिशा में चल पड़ी। सोनभद्र को भी समझ में आ चुका था, वे दासी की चालाकी समझ चुके थे। वे नर्मदा को पुकारते हुए उसके पीछे दौड़े, उनको लौट आने की विनती करने लगे। *लेकिन नर्मदा मैया ने एक बार सोनभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुँआरी रहने का फैसला कर लिया,और युवावस्था में ही सन्यासिनी का वेश धारण कर लिया*। 

भारत की सारी नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं लेकिन माँ नर्मदा पश्चिम की ओर चल पड़ी,रास्ते में जंगल पहाड़ियां आती गई, माँ नर्मदा ने उनमें से अपना रास्ता बनाती गई और आगे बढ़ती गई।

         ऐसा कहा जाता है कि नर्मदा परिक्रमा के समय कहीं- कहीं माँ नर्मदा का करुण विलाप सुनाई देता है, जिसे अनेक परिक्रमा वासियों ने महसूस किया और इस प्रकार वह कल- कल छल- छल बहती हुई अरब सागर में समा जाती है।

   माँ नर्मदा का दर्शन करने वाले भक्त 

चिर कुमारी माँ नर्मदा का सात्विक तेज, चारित्रिक सौंदर्य महसूस करते है।हमारे देश की बड़ी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती है लेकिन माँ नर्मदा बंगाल सागर की यात्रा छोड़कर गुस्से मे दौड़ते हुए अरब सागर में समा गई। पुराणों में कहा गया है कि, जो पुण्य गंगाजी में स्नान करने से मिलता है वह पुण्य नर्मदा जी के दर्शन मात्र से मिल जाता है।

      पुराणों के अनुसार-गंगा मैया  एक बार दुखी होकर भगवान के पास गई और उन्होंने कहा कि- हे प्रभु!  पृथ्वी पर इतने सारे पापी मुझमे स्नान करते है, उसके कारण मैं दूषित हो गई हूं मैं क्या करूँ?तब प्रभु ने कहा कि, हे देवी! आप नर्मदा जी में स्नान कर लीजिये आप के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।और मान्यता है कि *विशेष पर्वो पर माँ गंगा नर्मदा में स्नान करने आती है।* 

 *माँ नर्मदा से कोई भी मनौती मांगो माँ पूरी कर देती है* 

         इसकी गणना देश की सात पवित्र नदियों में की जाती है। *एकमात्र नर्मदा नदी ही ऐसी है जिसकी कि परिक्रमा की जाती है।* भारत की पांचवी सबसे बड़ी नदी है,यह अमरकंटक से निकलती है और गुजरात राज्य में खम्बात की खाड़ी में गिरती है। 

               नर्मदा अपने उद्गम स्थल से 1312 किलोमीटर का सफर तय करती है। इसका वर्णन रामायण,महाभारत,

स्कन्दपुराण में भी आता है। इस पर पुराण भी लिखा गया है।स्कंद पुराण में लिखा गया है कि, यह प्रलयकाल में भी चिरस्थाई रहेगी।इस नदी का एक नाम रेवा भी है। 

**माघ माह की शुक्लपक्ष की सप्तमी को नर्मदा जयंती मनाई जाती है।* 

देश की पवित्रतम नदियों में पुण्यसलिला नर्मदा मैया का विशिष्ट स्थान है । शुद्ध निर्मल जल सीधे ही ग्रहण किया जासकता है । अन्य नदियों की तुलना में इसका प्रवाह विपरीत दिशा में है और सनातन प्राचीन काल से इसकी परिक्रमा का महत्वपूर्ण स्थान है । पाप नाशिनी मोक्ष दायिनी नर्मदा में स्नान और परिक्रमा लाखों - करोड़ों की आस्था का केंद्र है । 

नर्मदा जयंती पर नर्मदा तट पर संस्कृति विभाग और स्थानीय संस्थाओं माध्यम से मंगलवार को निर्झरिणी महोत्सव मनाया जारहा है । इसके माध्यम से लोक संस्कृति दर्शन की प्रस्तुतियां होंगी ।

लोकगीतों के साथ लोकनृत्य , पारंपरिक पूजन अर्चन , लोकगायन भी होगा ।

ऐसी जीवनदायिनी माँ नर्मदा को कोटि कोटि नमन।

नर्मदे हर - नर्मदे हर से गुंज रहा नर्मदा तट ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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