किताबों की दुनिया :
दोहा रामायण (श्री राम कथा सार)
कवि – डॉ. प्रमोद शुक्ल
द्वारा- लतिका जाधव, पुणे ( महाराष्ट्र)
किताबों की दुनिया : श्री राम कथा सार है डॉ. प्रमोद शुक्ल का 'दोहा रामायण'
प्रस्तुत ‘दोहा रामायण’ काव्य विधा का आधार गोस्वामी श्री. तुलसीदास जी रचित ‘रामचरितमानस’ है।भारतीय भाषाओं पर इंग्लिश मीडियम का गंभीर भार हैं। उसको देखते हुए सरल हिंदी के दोहा जैसे मात्रिक छंद में रचा यह 'दोहा रामायण' वर्तमान स्थिति में महत्वपूर्ण लगता है। कवि डॉ. प्रमोद शुक्ल अपने मनोभाव प्रकट करते हुए इस बात को स्पष्ट करते हैं, “रामनवमी के दिन हमने संकल्प ले लिया कि हम अपने मनपसंद दोहा छंद में तथा समाज में दैनिक बोलचाल की खड़ी हिंदी बोली में ‘दोहा रामायण’ के अंतर्गत श्रीराम की कथा का सार लिखेंगे”। इस संकल्प की सिद्धता का आकार ‘दोहा रामायण’ जो कुल 1036 दोहा संख्या में रचित पठनीय है।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ‘श्री रामचरितमानस’ जैसा ही सात भागों में यह काव्य ग्रंथ रचा है। भाषा का रूप सहज और सरल है। बोलियों के शब्दों को तथा संस्कृत शब्दों को सहजता से इस दोहावली में बांधा हैं। हर प्रसंग में प्रेम, वात्सल्य,दुःख, विलाप,आवेश और आदर्श परंपराओं की भावनाओं का उत्कट दर्शन होता है। जिन्होंने ‘श्री रामचरित मानस’ पढ़ा है, उनके लिए 'दोहा रामायण' पढ़ना पुनःप्रत्यय का आनंद कहा जायेगा।
उदा. “डगमग ठुमकत चल रहे, इक दूजे को थाम।
अनुज गिरें तो थाम लें, अंगुली उनकी राम” ।।9।।
भाईयों की बाललीलाओं और बंधुभाव का लय में वर्णन किया है। जो गीत काव्य की विशेषता होती हैं।
तुलसीदास जी अपने प्रिय श्रीराम जी का वर्णन करते हुए अनेकों उपमाओं से उनको सजाते है।ऐसा ही कुछ यहां राम – लक्षण का वर्णन दिखाई देता है।
“एक गौर इक सांवला, अति सुंदर है रूप।
राम शीतल- छाया से,लखन सुबह की धूप।।37।।
सीतास्वयंवर और दशरथ राजा द्वारा श्रीराम जी के तिलक की तैयारी।लेकिन देवताओं को उपद्रवी असुरों का नाश करना था। वहीं सरस्वती से प्रार्थना करते है और श्रीराम जी का राजतिलक रूकवाते है। इसी के कारण कैकेयी में अचानक बदलाव आता है।वह राजा दशरथ से अपने वर मांगकर राम को वनवास गमन के लिए भेजने का हठ करती है। इस घटना को यहां रखा गया है। दैवी संकेत, दैवी घटनाओं से जुड़े मूल रामायण की रचनाओं में वर्णित प्रसंगों का आधार यहां पर लिया गया है।
इस काव्य में वर्णित नवविवाहित सीता का लज्जा भाव और संकेत बहुत ही विलोभनीय है।जो किसी समय हमारे समाज की नारी वर्ग में भी प्रचलित था। इस लज्जाभाव का सुंदर वर्णन किया है।
“यमुना जी को कर नमन, बढ़े लखन सिय राम
तभी स्त्रियों ने रोक कर,सिय से पूछा गाम।।242।।
दो युवकों को देखकर, पूछें साजन कौन।
गौर वर्ण देवर कहा, सिया हुई फिर मौन।।243।।
झुके लजीले वदन पर, सीता के दो नैन।
लज्जावश निकले नहीं, मुंह से कोई बैन।।244।।
संकेतों में बात की, ग्राम नारियों संग।
स्वामी मेरे हैं वहीं, श्यामल जिनके अंग।।245।।
जीवन के हर लम्हों में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए, इस बात की एक परंपरा हमारे देश में थी। रामायण आज भी भारत में इसी कारण वंदनीय है। रामायण जीवन कैसे जीना चाहिए इस आदर्श पर स्थित है। इस काव्य में रामायण के मधुर प्रसंग जीवन की सुंदरता को निखारते है। वैसे अब हमारा जीवन काफी बदल गया है ।लेकिन यह हमारे समाज का एक इतिहास था, जो इन ग्रंथों में बद्ध किया गया है।
तुलसीरामायण की सभी विशेषताओं को 'दोहा रामायण' में बांधता यह काव्य हमारे पूर्वजों की जीवनशैली का इतिहास लगता है। इस काव्य में रामायण के हर प्रसंगों में निर्मित नाट्य को कुशलता से व्यक्त किया गया है। युद्ध, राजनीति, संघर्ष और मिलन जैसी घटनाओं को भावनात्मक सरल दोहों में बांधा हैं। यह काव्य संक्षेप में तुलसीरामायण को प्रस्तुत करता है।लेकिन यहां केवल ‘दोहा’ इस एक ही छंद मे इसकी रचना की है, इसलिए इसका शीर्षक ‘दोहा रामायण’ है।
आज वर्तमान में इस काव्य का अपना एक निश्चित महत्त्व है। जिनके पास प्राचीन रामायण पढ़ने के लिए समय नहीं है वह भी इस काव्य को पढ़कर आसानी से समझ सकेंगे। बच्चों से बुजुर्गों तक सबको रामायण का सार समझाने की क्षमता इस काव्य में है।श्री. प्रमोद शुक्ल जी को इस अनुपम ‘दोहा रामायण’ की रचना करने के लिए साधुवाद!
द्वारा – लतिका जाधव, पुणे, महाराष्ट्र
-------------------------------------------------
दोहा रामायण (काव्य)
कवि – डॉ. प्रमोद शुक्ल
कश्यप पब्लिकेशन,
गाजियाबाद,05, (उ.प्र.)
प्र.सं.2024, मूल्य- 225/-,पृ.सं. 112
.jpg)

संपादक श्री. देवेंद्र सोनी जी,
ReplyDeleteमेरा 'दोहा रामायण' पर लिखा आलेख प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत आभार!
बहुत बहुत आभार
ReplyDelete