काव्य :
चिड़िया
मेरी प्यारी प्यारी चिड़िया,छोटी सी मन भावन चिड़िया,
चूँ चूँ चीं चीं गाती चिड़िया, अब कहांँ गई वो प्यारी चिड़िया।
ज्वार बाजरी के दाने ही,अपनी पसंद से चुगती चिड़िया,
छोटी चोंच में छोटे दाने, भरकर के उड़ जाती चिड़िया।
नहीं ठहरती एक जगह, चंचल स्वभाव की है ये चिड़िया,
नहीं किसी से कभी ये लड़ती,बडी शांती प्रिय ये चिड़िया।
मत काटों पेड़ों को कभी भी, इन्हें घोंसला तो बनाना है,
जीने का हक सबको इस जग में, यही समझ में लाना है।
इनके लिए थोड़ा सा दाना पानी का इन्तजाम कर जाना है,
लुप्त हो रही इस प्यारी गौरैया की जाति को मुथा बचाना है।
- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव,मुम्बई
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