प्रसंगवश – 04 जून: बाल यातना एवं अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस
मासूमियत की चीखें और हमारी चुप्पी: कब टूटेगा ये सन्नाटा?
[हर लापता बच्चा हमारी मानवता पर एक सवाल है]
दुनिया तब तक निर्दोष नहीं कहलाएगी, जब तक किसी मासूम बच्चे की चीखें अंधेरे में गूंजती रहें और समाज चुपचाप आंखें फेर ले। बाल यातना और अवैध तस्करी हमारे समय का सबसे घृणित अपराध है, जो मानवता के माथे पर काले धब्बे की तरह उभरता है। क्या हम उस दुनिया का हिस्सा बनना चाहते हैं, जहां बच्चों की मासूम हंसी डर की सिसकियों में बदल जाए? जहां उनके सपनों के नन्हें कदमों को जंजीरों में जकड़ दिया जाए? 4 जून, बाल यातना एवं अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस, हमें यही सवाल पूछता है और एक जवाब की मांग करता है — न केवल शब्दों में, बल्कि कर्मों में।
आज विश्व भर में लाखों बच्चे शोषण, दमन और यातना का शिकार हो रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के 2020 के अनुमान के अनुसार, विश्व में लगभग 16 करोड़ बच्चे बाल श्रम में फंसे हैं, और लाखों बच्चे तस्करी का शिकार होकर यौन शोषण, जबरन मजदूरी, सशस्त्र संघर्षों में सैनिक बनने, या घरेलू दासता जैसे अमानवीय हालातों में जीने को मजबूर हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि हर साल करीब 12 लाख बच्चे मानव तस्करी का शिकार बनते हैं, जिनमें से अधिकांश लड़कियां यौन शोषण के लिए तस्करी की जाती हैं। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि उन मासूमों की चीखें हैं, जिनका बचपन छीन लिया गया है। ये बच्चे न केवल अपने अधिकारों से वंचित हैं, बल्कि उनकी पहचान, स्वतंत्रता और भविष्य भी कुचल दिए गए हैं।
यह अपराध इतना कपटपूर्ण है कि यह अक्सर 'अदृश्य' रहता है। तस्कर संगठित गिरोहों के रूप में काम करते हैं, जो गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक उदासीनता का फायदा उठाते हैं। भारत जैसे देश में, जहां सामाजिक-आर्थिक असमानता और जागरूकता की कमी व्यापक है, यह समस्या और भी गहरी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल हजारों बच्चे लापता हो जाते हैं, जिनमें से कई तस्करी के शिकार बनते हैं। कई बार माता-पिता, बेहतर भविष्य के वादे में धोखा खाकर, अपने बच्चों को दलालों के हवाले कर देते हैं। फिर वे बच्चे कभी वापस नहीं लौटते — सिवाय किसी अखबार के छोटे से कॉलम या पुलिस रिकॉर्ड की ठंडी फाइलों में।
बाल तस्करी और यातना का यह घिनौना धंधा केवल कुछ अपराधियों तक सीमित नहीं है; यह एक वैश्विक तंत्र है, जो सीमाओं, संस्कृतियों और समाजों को लांघता है। यह अपराध हमारे आसपास, हमारे शहरों, गांवों और गलियों में पनपता है। गरीबी और बेरोजगारी इसकी जड़ें मजबूत करते हैं, जबकि अज्ञानता और उदासीनता इसे पनपने का मौका देती हैं। फिर भी, समाज का एक बड़ा हिस्सा इसे 'दूर की समस्या' मानकर चुप रहता है। लेकिन सच यह है कि जब तक हम इस सच को स्वीकार नहीं करते कि यह हमारी साझा जिम्मेदारी है, तब तक यह अंधेरा हमारी सभ्यता को निगलता रहेगा।
इसके खिलाफ लड़ाई केवल कानूनों तक सीमित नहीं हो सकती। भारत में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) एक्ट, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, और मानव तस्करी निवारण अधिनियम जैसे कानून मौजूद हैं, लेकिन इनका प्रभावी कार्यान्वयन अभी भी एक चुनौती है। कानून तभी सार्थक होते हैं, जब समाज उनकी भावना को अपनाए। इसके लिए हमें एक जागरूक, संवेदनशील और सक्रिय समाज की जरूरत है। हर स्कूल, हर पंचायत, हर मोहल्ले में यह संदेश गूंजना चाहिए कि कोई भी बच्चा बिकाऊ नहीं है। शिक्षा और जागरूकता इस लड़ाई का सबसे मजबूत हथियार हैं। जब हर व्यक्ति यह समझ लेगा कि बच्चों का शोषण केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ जंग है, तभी इसकी जड़ें कमजोर होंगी।
आज के डिजिटल युग में बाल तस्करी ने नए रूप ले लिए हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया बच्चों को फंसाने का बड़ा जरिया बन गए हैं। साइबर अपराधी मासूमों को झूठे वादों, दोस्ती के जाल, या डराने-धमकाने के जरिए फंसाते हैं। यूनाइटेड नेशंस की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन बाल शोषण की घटनाएं पिछले एक दशक में दोगुनी हो गई हैं। ऐसे में साइबर निगरानी को मजबूत करना और अभिभावकों को अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने के लिए शिक्षित करना जरूरी है। साथ ही, तकनीक का सकारात्मक उपयोग, जैसे कि लापता बच्चों की तलाश में डेटाबेस और ट्रैकिंग सिस्टम, इस लड़ाई में मददगार हो सकता है।
इसके अलावा, जो बच्चे तस्करी और यातना का शिकार हो चुके हैं, उन्हें समाज में दोबारा स्थापित करने की जरूरत है। गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और सामाजिक संस्थाओं को मनोवैज्ञानिक सहायता, शिक्षा और पुनर्वास के अवसर प्रदान करने चाहिए। भारत में 'बचपन बचाओ आंदोलन' जैसे संगठन इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनकी पहुंच सीमित है। सरकार, समाज और निजी क्षेत्र को मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाना होगा, जो हर पीड़ित बच्चे तक पहुंच सके।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या हम बस चुपचाप पढ़कर आगे बढ़ जाएंगे, या सच में कुछ बदलने की हिम्मत करेंगे? जब कोई मासूम बच्चा दर्द से कराहता है और हम आंखें फेर लेते हैं, तब दोषी सिर्फ वह दरिंदा नहीं होता — हम भी उसके भागीदार बन जाते हैं। अब वक्त सिर्फ बातों का नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का है। हमें उन मासूम आंखों में फिर से सपनों की चमक लानी है, जिनसे बचपन छीन लिया गया। हमें उन नन्हें पैरों को आज़ादी की ज़मीन पर चलने देना है, जिन्हें अब तक बर्बरता ने बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।
हर वह हाथ जो एक मासूम को शोषण से बचाता है, हर वह आवाज जो अन्याय के खिलाफ गूंजती है — वही असली इंसानियत का प्रहरी है। एक बच्चे को बचाना सिर्फ एक जान बचाना नहीं, बल्कि पूरी मानवता के भविष्य को सुरक्षित करना है। जब इस धरती का आख़िरी बच्चा भी निडर होकर मुस्कुरा सके, जब हर बालक को उसका बचपन, उसकी शिक्षा, और अपने सपनों को उड़ान देने की आज़ादी मिल सके — तभी हम खुद को एक सभ्य समाज कहने का हक़दार होंगे। इस 4 जून, आइए एक वादा करें — हम मूक दर्शक नहीं बनेंगे, हम बदलाव की आग बनकर उठेंगे। क्योंकि किसी एक बच्चे की मुस्कान में ही वो उजाला छिपा है, जो इस दुनिया के सबसे गहरे अंधेरे को भी रोशन कर सकता है।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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