शिक्षा का उद्देश्य क्या होना चाहिए_ रोजगार या व्यक्तित्व विकास
शिक्षा व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक है,यह जन्म के पश्चात ही आरम्भ हो जाती है, माँ ,पिता,परिवार के अन्य सभी सदस्य और बालक /बालिका के संपर्क में आने वाले,सभी लोग उसे शिक्षित करने में ज्ञात या अज्ञात रूप से,विकसित करने,और शिक्षित करने में योगदान देते है,और उतना ही योगदान होता है उन परिस्थितियों और वातावरण का जिसमें वह बड़ा होता है।
शिक्षा हम पाठशालाओं ,विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं से ही मात्र ,नहीं प्राप्त करते है,अपितु स्थान,वातावरण,साथी ,परिवार जन और जीवन के क्रम में आए अनुभव से भी शिक्षा मिलती है। यहाँ हम शिक्षण संस्थाओं से प्राप्त शिक्षा की चर्चा करते हैं।
*मेरे विचार से शिक्षा का उद्देश्य बहुआयामी होना चाहिए*,
इसमें विभिन्न विषयों का ज्ञान मिले,जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से सामना करने की क्षमता विकसित हो,,समाज में हर तरह के लोग होते है,उनसे कैसे व्यवहार करें,इसका भी अध्ययन होना चाहिए,शिक्षा संस्कारी बनाये ये भी आवश्यक है,विभिन्न स्किल्स भी सिखाई जानी चाहिए,ताकि नौकरी न मिलने पर भी,रुचि अनुसार उस विशेष स्किल से स्वरोजगार में जाया जा सके,
सरकारी रोजगार तो हमारे समय की तुलना में बहुत कम हो गए हैं,जनसंख्या भी काफी बढ़ चुकी है,आज के विद्यार्थी हमारे समय की तुलना में अधिक जानकार भी हैं किंतु रोजगार विशेषकर, सरकारी नौकरी करने की मानसिकता से समाज अभी उबरा नहीं है।
स्किल का विकास,और नए समसामयिक विषयों का अध्ययन अभी भी बहुत प्रकार के रोजगार उपलब्ध कराने में सक्षम है।
सारांश में मेरे विचार में शिक्षा का उद्देश्य संपूर्णता लिए होना चाहिए, व्यक्तित्व का विकास ऐसी चाबी है जिससे रोजगार और स्वरोजगार सभी के ताले खुलेंगे।
कहावत है ना, कि जिन खोजा तिन पाइयां ,खोजने पर स्वरोजगार तो सुनिश्चित ही है,और अन्य रोजगार भी मिलते हैं,प्रयास ईमानदार होने आवश्यक हैं ।
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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