काव्य :
मत करना अभिमान
मत करना अभिमान कभी भी,अपने धन दौलत रिश्तो पर।
जितना उड़ना है उड़ ले बंदे, जब तक है सलामत तेरे पर।
तुझे जला या दफना के सब, चले जायेंगे अपने घर।
कोई साथ नहीं आयेगा तेरे, यही बात तूँ समझा कर।
नहीं करना जोश जवानी का, ये उम्र भर नहीं साथ है।
चार दिनों की चांँदनी है ये, फिर तो अंधेरी रात हैं।
नहीं किसी निर्बल पर तूँ अपना बल अजमाया कर।
कोई साथ नहीं आयेगा तेरे, यही बात को समझा कर।
छोड़ो घमंड तुम रूप रंग का, ये तो कुदरत की माया है।
काला हो या गोरा दो ही रंग तो, ऊपर वाले ने बनाया है।
कोई अपंग हो या दरिद्र कोई, नहीं कभी ठुकराया कर।
कोई साथ नहीं आयेगा, यही बात को समझा कर।
नहीं घमंड कर अपने ज्ञान पर,तेरा सारा ज्ञान अधूरा है।
कितना भी तूँ पोथी पढ ले, ये होता कभी नहीं पूरा है।
दीन दुखियों की सेवा कर के, अपना फर्ज निभाया कर।
कोई साथ नहीं आयेगा तेरे, यही बात को समझा कर।
भला किसी का करो तो अच्छा, बुरा किसी का सोचों मत।
दुआ किसी की मिले तो अच्छा,बद्दूआ किसी का लेना मत।
जैसी करनी वैसी भरनी, मुथा की विनती को समझा कर ।
कोई साथ नहीं आयेगा तेरे,यही बात को समझा कर।
- गीतकार-छगनलाल मुथा-सान्डेराव
मुम्बई
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