स्मार्ट नहीं-ओवर स्मार्ट मीटर से जनता की जेब पर डकैती - कापरे
इटारसी में बिजली के स्मार्ट मीटरों की स्थापना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस योजना को लेकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विरोध देखने को मिल रहा है। इस योजना के तहत राज्य सरकार ने प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया शुरू की है। इस योजना का लक्ष्य बिजली वितरण में पारदर्शिता, बिजली चोरी पर रोक और उपभोक्ताओं को अपनी खपत पर नियंत्रण करने का है। हालांकि, इस योजना को लेकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विरोध देखने को मिल रहा है।
विशेष रूप से किसान संगठन, कांग्रेस जैसे विपक्षी दल इसे आम जनता पर आर्थिक बोझ और निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की साजिश बता रहे हैं। वहीं, कुछ किसानों के बढ़ते बिजली बिल, तकनीकी खामियां के चलते भी यह योजना विवादों में आ गई है।
*जनता क्यों कर रही है स्मार्ट मीटर्स का विरोध?*
अभी तक जो सामने आया है उसके मुताबिक, विरोध का कारण स्मार्ट मीटर का रेग्युलर मीटर की तुलना में तेज चलना बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इसकी वजह से बिल दोगुना आ रहा है।
उपभोक्ताओं का कहना है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद उनके बिजली बिल 10 से 30 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। कुछ मामलों में तो बिल लाखों रुपये तक पहुंच गए, जो सामान्य घरों की खपत के हिसाब से असंभव है।
*विपक्ष के विद्युत वितरण कंपनी के खिलाफ तर्क।*
कांग्रेस नेता अमित कापरे ने स्मार्ट मीटर योजना को स्मार्ट भ्रष्टाचार करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह स्मार्ट मीटर नहीं ओवर स्मार्ट मीटर है जो जनता की जेब पर सीधे डकैती डालने का काम करेगा। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक मीटर पूरी तरह सही हैं, फिर भी उन्हें बदलकर स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए शुरू की गई है।
कापरे ने प्रेस नोट के माध्यम से कहा कि हमने इसका विरोध इसलिए किया क्योंकि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। लोगों से पूछे बिना मीटर बदलना गलत है। स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली के बिल में बढ़ोतरी होगी। लोगों ने आशंका जताई कि नए मीटर से बिल अधिक आने का डर है, जबकि पुराने मीटर से ऐसा कोई अनुभव नहीं था।
कापरे ने आरोप लगाया कि बिजली कंपनियां बेलगाम तरीके से काम कर रही हैं और इससे जनता को करोड़ों रुपये का नुकसान हो चुका है। यह योजना बिजली क्षेत्र के निजीकरण की दिशा में एक कदम है, जिससे निजी कंपनियां लाभान्वित होंगी।
इसी कारण स्मार्ट मीटर का अन्य राज्यों में भी विरोध हो रहा है।
*अहित पूरे देश का है केवल मध्य प्रदेश का नहीं।*
उन्होंने आगे कहा कि यह मुद्दा केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी स्मार्ट मीटरों के खिलाफ व्यापक विरोध हो रहा है। बंगाल में इस योजना का विरोध बढ़ने के बाद इसे फिलहाल बंद कर दिया गया है।
मध्यप्रदेश में कई जिलों में इन मीटरों के विरोध में ज्ञापन दिए गए हैं। लोगों को यह भी कहा गया कि उपभोक्ताओं के पास स्मार्ट मीटर लगवाने या न लगवाने का विकल्प है, फिर भी बिजली कंपनी जबरन इन्हें थोप रही है। जबकि सच्चाई यह है कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 और एमपी इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड 2021 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो उपभोक्ता को मीटर लगाने का चयन करने का अधिकार देता हो।
हालांकि उपभोक्ता को यह अधिकार जरूर है कि वह जांच सके कि उसके यहां लगा मीटर टेस्टेड है या नहीं। यदि मीटर की रीडिंग 00 है, तो संभव है कि वह बिना लैब टेस्ट के लगाया गया हो। वहीं यदि रीडिंग 1 या 2 है तो यह संकेत है कि मीटर की लैब में जांच हुई है।ऐसी स्थिति में उपभोक्ता मीटर की टेस्ट रिपोर्ट मांग सकता है, क्योंकि एमपी इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड 2021 की धारा 8.17 के अनुसार, उपभोक्ता को मीटर की सटीकता पर संदेह होने पर परीक्षण की मांग करने का पूरा अधिकार है, और वितरण कंपनी को 15 दिन के भीतर जांच कर परिणाम उपलब्ध कराना होता है।
*पोस्ट नहीं प्री पेड है बिजली बिल।*
दरअसल, स्मार्ट मीटर एक डिजिटल तकनीक है, जो वास्तविक समय (real-time) में बिजली खपत का डेटा एकत्र करती है और उपभोक्ताओं को मोबाइल ऐप या पोर्टल के माध्यम से उनकी खपत, बैलेंस और बिलिंग की जानकारी प्रदान करती है। यह प्रीपेड सिस्टम पर आधारित है, यानी उपभोक्ता को मोबाइल रिचार्ज की तरह बिजली के लिए पहले भुगतान करना होगा।
इस प्रीपेड सिस्टम पर कांग्रेस पार्षद अमित कापरे ने कहा कि जिस देश की सवा अरब जनसंख्या का 64 प्रतिशत यानी अस्सी करोड़ लोग अभी भी 5 किलो राशन पर आश्रित है उनके लिए स्मार्ट मीटर अभिशाप से कम नहीं। वर्तमान सरकार कोरोना के लॉक डाउन और नोटबंदी लाकर पहले ही गरीबों की कमर तो तोड़ चुकी है। अब स्मार्ट मीटर के जरिए मोदी सरकार गरीबों के पेट पर भी लात मारना चाह रही है।