व्यंग्य लेखन की मर्यादाएं
— विवेक रंजन श्रीवास्तव ,भोपाल
व्यंग्य लेखन, साहित्य की वह कड़वी गोली है, जिसे मीठे शब्दों की चाशनी में लपेटकर पाठक को परोसा जाता है। यह समाज के फोड़े-फुंसियों की शल्यक्रिया तो करता है, परंतु इसकी भी कुछ मर्यादाएं हैं , वरना व्यंग्य, व्यंग्य न रहकर ‘प्रलाप’ बन जाता है।
अशिष्टता से बचाव पहली सीमा है ।व्यंग्यकार अगर भाषा की मर्यादा लांघ जाए, तो उसका लेखन ‘कटाक्ष’ की जगह ‘कटुता’ बन जाता है। जैसे कोई डॉक्टर इलाज की जगह ऑपरेशन में ही मरीज़ को घायल कर दे। व्यंग्य की भाषा तीखी जरूर हो, पर सभ्यता की रेखा के भीतर रहे।
दूसरी सीमा है , व्यक्तिगत आक्षेप से परहेज। व्यंग्य किसी एक व्यक्ति को लक्ष्य बनाकर किया गया तो वह ‘चरित्र हनन’ कहलाएगा, ‘समाज सुधार’ नहीं। किसी नेता के पेट पर व्यंग्य करना तब तक ठीक है, जब तक वह पेट प्रतीक हो ‘लालच’ का, न कि निजी स्वास्थ्य का।
सत्य और तथ्य में संतुलन तीसरी सीमा कही जा सकती है। व्यंग्यकार की कलम कल्पना की उड़ान भर सकती है, पर अगर वह तथ्यात्मक त्रुटियों से भरी हो, तो व्यंग्यकार की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। "प्याज सौ रुपए किलो" पर व्यंग्य करते हुए जब प्याज 20 रु किलो हो, तो पाठक खुद व्यंग्यकार पर हँसने लगता है।
चौथी सीमा, सामाजिक संवेदनशीलता , जाति, लिंग, धर्म जैसे विषयों पर व्यंग्य लिखते समय बेहद संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए। व्यंग्य की छींटाकशी अगर पीड़ित वर्ग को और आहत करे, तो वह सत्ता का हथियार बन जाता है, व्यंग्यकार का नहीं। कटाक्ष वहीं तक हो, जहाँ तक वह अन्याय की धज्जियां उड़ाए, न कि पीड़ित की।
पाँचवीं और जरूरी सीमा आत्ममुग्धता से दूरी है। कई व्यंग्यकार अपने लेखन को ‘ज्ञान का अंतिम सत्य’ मान लेते हैं, और दूसरों के मत को खारिज कर देते हैं। यह दृष्टिकोण व्यंग्य को तर्क की जगह अहंकार का माध्यम बना देता है।
संक्षेप में, व्यंग्य लेखन एक शार्प चाकू है जिसका उद्देश्य समाज की सर्जरी करना है, न कि खून बहाना। इसकी सीमाएं वही हैं जो किसी जिम्मेदार सर्जन की होती हैं । शुद्धता, सजगता, और संवेदनशीलता। मर्यादा के भीतर रहकर किया गया व्यंग्य न केवल असरदार होता है, बल्कि कालजयी भी होता है। वरना, व्यंग्य की धार खुद लेखक को ही घायल कर सकती है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
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