काव्य :
है रक्षा बन्धन, स्नेह का बन्धन
रक्षा का प्रण लेता मैं
सदा सुखी तूँ रहना
अपने ,दुख और मर्म, मन के
मुझसे ही तूँ कहना
आवेंगे,जीवन में तेरे,
बसन्त और पतझड़ भी
कष्ट,सभी सह लेना ,निज तूँ
परिवार पर,समर्पित रहना
माँ ,सा ,तूनें पोसा, पाला
दिया स्नेह,संरक्षण
आजीवन ,तेरे कष्ट हरूँगा
है,ये,भाई का प्रण
सावन सी तूँ,लहके, हरषे
तुझ पर खुशियाँ बरसे
झूलों पर झूलें,सब उमंगें
और रंग होली से,बरसें
तीज,त्यौहार व उत्सव सुख हों
सतत ,तेरे जीवन में
विजय सदा,तुझको ही चूमे
विपदाओं के रण में
बच्चों और तेरे पति की दुनिया
और मैके का जीवन
दें उत्साह व प्रेरणा तुझको
हो सफल तेरा,परिवार सृजन
निज परिवार और मैके से विदाई
है प्रथा व सामाजिक मजबूरी
बहिन की रक्षा,व प्रेम भाई का
है करता , सब कमियाँ पूरी
है रक्षा बन्धन, स्नेह का बन्धन
भ्राता-कर्तब्यों का निर्वहन
इसकी शुचिता और शक्ति का
ब्रज, दूजा है न कोई उदाहरण
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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