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काव्य : बरसों बाद - डा.नीलम ,अजमेर


 काव्य : 

बरसों बाद


बरसों बाद

अलहदगी की

पीर मन में

संजोए 

जो बिछड़ गये थे

अपने आँगन,

चौबारों से

बिनाई से बुझी

आँखों में

अतीत को फिर

ढूँढने सरहद पार

आ गये।


हर रोज जिन 

आवाजों के कारण

नींद में भी

चौंक-चौंक उठते थे

बरसो

आज........

ताकत चुके पाँव

दौड़ने को आतुर

धीरे-धीरे

चलते हैं उन गलियों/

गलियारों में

जिनमें कभी माँ की

आवाज को

नजरअंदाज कर

दोस्तों को आवाज देते

बेलाग दौड़ पड़ते थे।


कंपकंपाते हाथ

सरसराकर

टटोल-टटोलकर

छूकर

फिर अहसास से

भीग रहे हैं

कि कभी इन्हीं दीवारों

से टेक लगा

खड़े होते थे अपना

घर होने का।


खण्डहर होतीं

इमारतें,

जख्मी बुए-बारियां*

बुझी-बुझी दीवारें

भी इसी आस में

हैं खड़ी कि 

आएंगे इकदिन 

इस घर के चाहने वाले

फिर बिछड़ी रुहों का

होगा मिलन

बरसों बाद फिर

हुआ आज मिलन।


*बुए-बारियां-दरवाजे, खिड़कियां


    -  डा.नीलम ,अजमेर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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