काव्य :
बरसों बाद
बरसों बाद
अलहदगी की
पीर मन में
संजोए
जो बिछड़ गये थे
अपने आँगन,
चौबारों से
बिनाई से बुझी
आँखों में
अतीत को फिर
ढूँढने सरहद पार
आ गये।
हर रोज जिन
आवाजों के कारण
नींद में भी
चौंक-चौंक उठते थे
बरसो
आज........
ताकत चुके पाँव
दौड़ने को आतुर
धीरे-धीरे
चलते हैं उन गलियों/
गलियारों में
जिनमें कभी माँ की
आवाज को
नजरअंदाज कर
दोस्तों को आवाज देते
बेलाग दौड़ पड़ते थे।
कंपकंपाते हाथ
सरसराकर
टटोल-टटोलकर
छूकर
फिर अहसास से
भीग रहे हैं
कि कभी इन्हीं दीवारों
से टेक लगा
खड़े होते थे अपना
घर होने का।
खण्डहर होतीं
इमारतें,
जख्मी बुए-बारियां*
बुझी-बुझी दीवारें
भी इसी आस में
हैं खड़ी कि
आएंगे इकदिन
इस घर के चाहने वाले
फिर बिछड़ी रुहों का
होगा मिलन
बरसों बाद फिर
हुआ आज मिलन।
*बुए-बारियां-दरवाजे, खिड़कियां
- डा.नीलम ,अजमेर
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