काव्य :
रक्षाबंधन कितना है अनमोल
सोच रहा हूँ आज आएगी
मेरी बहना उतनी दूर गांव से
कौन खुशी, उसे करूँ अर्पण,
परेशान हूँ मैं दिन भर से।
दिनभर की आज की ये मजदूरी
मिली है जितनी ,वो बड़ी जरूरी।
हफ्ते भर से सब जोड़ मैं रहा हूँ
पल्लूमें अब उसको समेट रहा हूँ।
हाथ खाली बिल्कुल नहीं रखूंगा
बेटे के जूते मैं, बाद में ही लूंगा।
बड़ेभैया का वचन निभाके रहूंगा
बचपन की रक्षा वादा निभाउंगा।
अफसर से अपने मिन्नतें करूंगा
आधे पेट,फाका करके पाऊंगा।
निराश उसे बिल्कुल नहीं करूंगा
पसंद उसकी सारी मिठाई लूंगा।
रसोई उसकी भाभी सजा लेगी
मनपसंद पकवान से भर देगी ।
साड़ी भी उसने खरीद रखी है
जतन से बहुत सम्हाल रखी है।।
सालभर में एकबार तो आती है
खुशियों को झोली में समेटती है।
दुःखों को मेरे समेटकर उसने रखा
मुस्कुराहटों को सदा ही बांट रखा।
जाने कैसे वो चिंता भांप जाती है।
संकटमोचन बनके मानो आती है ।
भैया, बहिना नचाहे कोई उपहार
बस चाहे आप सबका वही प्यार।
आती जब भी, क्यों सब छुपाते
रिश्तोंमें इन बातों से दूरी बढ़ाते।
बचपन अपना वैसा ही बना रहे
आपसी लेनदेन व्यवहार न रहे।
जीवन में सब रिश्ते बनाने पड़ते
बहन-भाई,जन्म से अनमोल होते ।
- अलका मधुसूदन पटेल
जबलपुर म प्र
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